मंगलवार, 1 जुलाई 2014

!! साँई और स्वामी स्वरूपानंद !!

ये सच है की हिन्दू धर्म में बड़ी लचक है ; ईश्वर के सैकड़ों रूप हैं ; सैकड़ों नाम हैं ; और गुरु का महत्व ईश्वर से भी बड़ा है ; पर गुरु कभी ईश्वर नहीं हो सकता ये भी सच है !!
सत्य साईं ने या शिर्डी साईं ने कभी भी स्वयं को ईश्वर नहीं कहा !!
अगर आप सनातन धर्म और ईश्वर को जानने की कोशिश करें तो आदि शक्ति ही ईश्वर है और आदि  शक्ति से सिर्फ ३ स्वरूपों का जन्म हुआ है जिनका वर्णन वेद और उपनिषद में मिलता है !!
ये तीन रूप हैं -
१- ब्रम्ह - श्रष्टि के निर्माता
२- विष्णु - श्रष्टि के पालनकर्ता
३- शिव - श्रष्टि के संघारक
इसके बाद सभी अवतार हुए हैं !!
कृष्ण , राम से लेकर वाराह और हनुमान तक !!

अवतार सिर्फ और सिर्फ दुर्जनों के संहार और नीति शिक्षा देने के उद्देश्य से पृथ्वी पर अवतरित हुए थे !!

साईं को गुरु माना जा सकता है ; अवतार माना जा सकता है पर ईश्वर नहीं माना जा सकता !!

सर्वधर्म संभाव के रूप में शिर्डी साईं एक शानदार प्रतीक हैं ; मैं स्वयं अनन्य साईं भक्त हूँ ;

पहली बार शिर्डी मैं अपने पिता की गोद में चढ़कर गया था !!

द्वारका माई से मुझे बहुत लगाव है !!

इतना सब मानने के बाद भी मैं शंकराचार्य जी को सही नहीं मानता ; क्योंकि ये साईं विरोधी वक्तव्य राजनीतिक स्वार्थवश दिया गया प्रतीत होता है ?

कुछ समय से शिर्डी में आने वाले चढ़ावे पर भी तरह तरह के वक्तव्य दिए जाने लगे हैं !!

संघ स्वामी स्वरूपानंद शंकराचार्य जी के साथ है ; क्या ये औचक बात नहीं है ?

स्वरूपानंद जी पर हमेशा कांग्रेसी शंकराचार्य होने का आरोप लगता रहा है - आज संघ उनके साथ कैसे ?

उमा भारती हमेशा से स्वरूपानंद जी का विरोध करती रहीं है - उनका विरोध स्वाभाविक था और  शायद वे राजनीति समझ नहीं पायीं.

ये साईं विरोधी वक्तव्य और संघ का साथ इशारा करता है की राज शक्ति - जन शक्ति को प्रेरित कर रही है की धर्म को पूरी निष्ठा से मानो, समझो और उसका आदर करो।

इसी धार्मिक ध्रुवीकरण की बात हमेशा संघ करता रहा है।

सनातन धर्म का ध्रुवीकरण किसी धर्म विशेष के विरोध से नहीं हो सकता क्योंकि बहुसंख्यक हिन्दू सहष्णुता में विश्वास रखता है ; वो धार्मिक उन्माद के खिलाफ वोट देता है;

१९९३ के चुनाव में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद इन्ही सनातन धर्मावलम्बियों ने कांग्रेस की सरकारे एम् पी, हिमांचल, यू पी में बनाई थी और बीजेपी ने मुंह की खाई थी।

सनातन धर्मावलम्बी जब तक अपनी जड़ों से नहीं जुड़ेगा तब तक वो संगठित नहीं होगा ये संघ मानता है।

इसलिए शंकराचार्य परंपरा को जीवित करना जरूरी है ;

इस मंथन के लिए मथानी का काम सबसे बढ़िया सिर्फ और सिर्फ स्वरूपानंद जी कर सकते हैं ; वे दिग्विजय सिंह जैसे बड़े कांग्रेसी नेता के गुरु हैं ; बीजेपी का कोई भी नेता उनको अपना गुरु नहीं मानता ? बीजेपी ने हमेशा स्वरूपानंद जी का विरोध किया है।

इस मुद्दे को उठाने और युवा पीढ़ी को अपने धर्म को जानने के लिए प्रेरित करने के लिए वे सबसे उपयुक्त पात्र हैं .

आज का युवा गूगल पर मज़ार और मंदिर का अर्थ खोज रहा है ; यही संघ चाहता है सनातन धर्मावलम्बी अपने धर्म को जाने ; इतिहास को भी धार्मिक नज़रिए से देखें !!

बहुत सारी चीज़ें हैं जो सत्ता के जोर पर बदली गयीं हैं ; उन्हें संघ दुरुस्त करना चाहता है , कुछ चीज़ों को अपने हिसाब से लिखना चाहता है !!

यही सत्ता का नशा है यही धर्म है और इसी जोड़ तोड़ से दुनिया चल रही है ; किसी के लिए ये सही है और किसी के लिए गलत  ?

ओशो के बताये साक्षी भाव की बात करें तो ये प्रकृति का नियम है ; बिलकुल वैसे ही जैसे आज जहाँ रेगिस्तान हैं वहां कभी समुद्र हुआ करता था !!

आप माने या न माने पर मैं पूरे विश्वास से मानता हूँ क़ि आने वाले समय में ऐसी ही बातें चर्चा में बनी रहेंगी !!

सच्चिदानंद सदगुरु साईं नाथ महाराज की जय !!

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