रविवार, 15 जून 2008

प्रतिव्यक्ति आय और सरकार.......


प्रतिव्यक्ति आय और सरकार.......
भारतीय अर्थव्यवस्था का आंकलन हमेशा से अर्थ शास्त्री करते रहे हैं और उसे सरकारें अपने नफे और नुकसान से जोड़ती आई हैं, राष्ट्रीय आय, प्रतिव्यक्ति आय जैसे कुछ शब्दों का उपयोग सरकार हमेशा से भ्रम फैलाने के लिए करती हैं....
राष्ट्रीय आय वह आय होती है जिसमें सारे देश के द्वारा अर्जित आय का योग होता है .
और प्रतिव्यक्ति आय राष्ट्रीय आय मे जनसंख्या का भाग देने से प्राप्त होती है.
सरकारें राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय को जानता की तरक्की से जोड़ कर देखती हैं.
आज देश की ७५% भूमि २५% लोगों के पास है और ७५% लोग २५% जमीन के मालिक हैं.
यही हालत उद्योग जगत की है यहाँ १५० परिवारों के पास देश की आधी से ज्यादा उत्पादन इकाइयां हैं और बाकि पूरे हिन्दुस्तान के व्यव्सायीयों के पास आधी से भी कम.
आज़ादी के बाद ३ दशकों तक विकास दर ३.५% थी, ८० मे ३%, ९० मैं यह ५.४% रही, २००० से २००७ सन तक ६.९% प्रति वर्ष रही. प्रति व्यक्ति आय ५% प्रतिवर्ष बड़ी. लेकिन विकास दर बदने से न तों बेरोजगारी कम हुई न गरीबी.
सरकारी आंकडे बताते हैं की उत्पादन बड़ा है लेकिन रोज़गार कम हुए हैं. इसका कारण पूँजी प्रधान तकनीक है. यह एक बहुत बड़ा पूँजी वादी षड्यंत्र है. किसी एक व्यक्ति की खुशहाली को पूरे देश की खुशहाली से कैसे जोडा जा सकता है.
आप ही सोचें अम्बानी बंधुओं ने अगर साल मे १०० करोड़ रु कमाए और राम और रहीम ने १ लाख तों इन चारों की प्रतिव्यक्ति आय २५ लाख २५ हजार रु हुई क्या ये आंकलन सही है.
आज पूँजीवादी इन्ही भ्रामक आंकडो का सहारा ले कर सरकारों से मन माने नियम बनवाते हैं,
आर्थिक विकास को उत्पादन से, प्रतिव्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय से जोड़ना हमेशा सही नहीं है.
आप ही सोंचे...
शराब के उत्पादन, विलासिता की वस्तु जैसे महंगी कार, एसी के उत्पादन में वृद्धि को आर्थिक विकास से जोडा जाता है. अगर पिछले वित्तीय वर्ष में शराब की दुकाने व उत्पादन २५% बड़ा तों शराब व्यवसाई की आय भी २५% बढेगी पर गरीब शराब पीने के लिए अपने घर का सामान बेंचेगा. और वर्षांत में सरकार कहेगी की शराब उद्योग के सहयोग से राजकीय आय और प्रतिव्यक्ति आय में क्रमशः १५% और ५% बढोतरी हुई.
सरकारों को गरीब के दर्द को समझना चाहिए उसकी मुसीबतों को समझना चाहिए न की आंकडों से खेलना उन्हें शोभा देता है.
आज भारत की ब्लू चिप कम्पनियो के सिर्फ ४.५% शेयर छोटे निवेशकों के पास हैं ज्यादातर बड़ी होल्डिंग्स विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास हैं इन कम्प्निओं से प्राप्त आय जाती तों विदेश है पर इसकी गड़ना होती राष्ट्रीय व प्रतिव्यक्ति आय में हैं.
पिछले दिनों अंतर राष्ट्रीय खाद्यान नीति शोध संस्थान ने भारत को आगाह किया है की अन्न उत्पादन के मामले में अब वह सबसे कम विकसित देशो की श्रेणी में आ गया है.
१८० देशो की इस सूची में पाकिस्तान ८८ वे स्थान पर भारत ९४ वे स्थान पर और चीन ४७ वे स्थान पर है. नेशनल सैम्पल सर्वे कहता है पश्चिम बंगाल, असाम और ओदिसा मे सबसे ज्यादा लोग भूखे सोते हैं. देश की १/३ आबादी दो वक्त के भोजन को महरूम है.
उद्योग तों बड़े है लेकिन रोज़गार कम हुए हैं.
इसपर सरकारों को ध्यान देना चाहिए.
अवस्थी.एस

2 टिप्पणियाँ:

दीपक 16 जून 2008 को 2:22 pm  

कडवा सच है ,कृपया से आरकुट मे भी पोस्ट करे !!

विजययात्रा 19 जून 2008 को 3:32 pm  

कहा जाता है कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है....जरुरत है शब्दों को जोर से दहाडने की.... क्योंकि, शब्द में शक्ति होती है......सचिन जी, आपने भारतीय अर्थव्यवस्था का आंकलन सही लगाया है जो हमारे बौद्धिक अर्थशास्त्री लगाते रहे है.....विभिन्न परिस्थितियों से जुडी भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भों के मूल में यदि जाएं तो एक प्रमुख यथार्थ स्पष्ट रूप से नजर आता है कि विकास, सामाजिक न्याय, बाजार की शक्तियों को प्रभावित करने वाले लक्ष्यों के बारे में भ्रम है, अनिश्चितता है। इसी भटकाव के कारण किसी भी रास्ते पर चला जाए या व्यवस्था को अपनाया जाए तो न तो आर्थिक समस्याओं का ही स्थायी हल होता है और न ही बाजार के बाहर रहने वाले वंचित वर्ग बाजार में प्रवेश कर पाते हैं। ऐसी लक्ष्यविहीनता और गलत नीतियों का नतीजा यह हुआ है कि पुरानी परिभाषाएं, मुहावरें और नियम-सभी अप्रासंगिक हो गए हैं और नई विकृतियां उभरकर बाजार में आई हैं। राष्ट्रीय आय को ही लें, जो किसी भी अर्थ में सारे राष्ट्र की सारी आमदनी नहीं है। इस पर कुछ ही लोगों की आय, संपत्ति और श्रम शक्ति का पृथक-पृथक एकछत्र अधिकार होता है। बचपन में एक रुपये में एक पसेरी चावल मिलता था। अब एक पसेरी के लिए ढाई से तीन सौ रुपये देने पडते है। महंगाई हिरण की तरह कुलांचे भर रही है और आमदनी है कि कछुए की चाल से चलती है। सरकार दावा करती है कि, राष्ट्रीय आमदनी में वृद्धि के साथ देशवासियों की भलाई और भौतिक कल्याण में वृद्धि होती है, सदैव सही और आवश्यक नहीं होता। राष्ट्रीय आय या प्रति व्यक्ति आय को विकास का प्रतीक बताना बहुत बडा सैद्धांतिक षडयंत्र है। विडंबना देखिए कि, सरकार कहती है कि शराब की दुकानें खुलने से राष्ट्रीय आय बढती है। आंकडों के सहारे भ्रामक और मिथ्या उपचार करना तथा गहरी मनोवैज्ञानिक चालों के आधार पर मनमाने नियमों का बनाना आज की व्यवस्था का विशेष गुण है।
आपका आलेख सोई हुई सरकार को जगा सकें यही उम्मीद है......आगे भी आप अपने प्रयास जारी रक्खें।
वंदे मातरम
जय हिंद