बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मोदी का अगला क़दम : जातिगत विघटन नहीं अपितु आर्थिक विषमता का फ़ायदा उठाना है !!

दलित राजनीति हो समाजवाद या सर्वजन हिताय की अवधारणा लिए हुए देश - उनको चलाने का काम तो वही कर सकता है जो समर्थ हो !
किराने की दुकान चलाने वाले बनिए को कोई भी सरकार वह सुविधाएँ नहीं दे सकती जो टाटा या अम्बानी को देती है ; यह शास्वत सत्य है !
विचार करिए एक संवैधानिक संशोधन पर और उस किराना व्यापारी को अम्बानी बनाने की कोशिश करिए; और फिर उससे लाभ लेने की कोशिश करिए !
इस पूरी प्रक्रिया में 50 साल तो लगेंगे - और शायद अम्बानी भी ख़त्म हो जाए और किराना व्यापारी भी नया अम्बानी न बन पाए या बन भी जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है !
यही भारतीय राजनीति है - हम मंडला बालघाट और झबुआ के आदिवासियों को नेता बनाते हैं !ताक़त देते हैं बड़े बड़े भाषण देते हैं ; लाभ की योजनाएँ बनाते हैं और जब चुनाव आता है तो उसी आदिवासी के गाँव के लोग गाँव के सवर्ण मालगुजार से पूछ कर वोट देते है ; क्यूँकि उन्हें उसी मालगुज़ार की मज़दूरी करनी है ; वही उसे पैसे उधार देता है ; वही मदद करता है वह मालगुज़ार अगर चाहे तो मदद न कर आपको दुत्कार भी सकता है !
यही परम्परा रही है सदियों से ; यही व्यवस्थाएँ रहेंगी सदियों तक !
यही वह खाई है जो पहले जातियों के बीच थी अब अमीर और ग़रीब के बीच है !
मोदी की एक ख़ासियत रही है उनने जाति आधारित समाज विखंडन की बात नहीं की ; समाज को बाँटने की कोशिश की धनी और ग़रीब के आधार पर जिसके चलते "नोट बंदी" का सामाजिक विरोध नहीं हो पाया !
दलित और ब्राह्मण विरोधी अवधारणा का मूल श्रेष्ठता और तिरस्कार था; अब किसी को श्रेष्ठता और तिरस्कार की समस्या (यू पी बिहार और मध्यप्रदेश के रीवा जिले को छोड़कर) है ही नहीं !
अब सम्मान बड़ी गाड़ी बड़ा बंगला देखकर होता है और तिरस्कार झोपड़ी और आपकी औक़ात देखकर !
पहले भी समस्या थी जलन की अब भी यही समस्या है - पहले इसे ब्राह्मण और दलित के बीच संघर्ष माना जाता था अब यही अमीरो और ग़रीबो के बीच का संघर्ष है
यह समस्या तत्कालीन बुज़ुर्ग नेताओं की समझ से परे का मामला है ; यह बिलकुल वैसा ही है जैसे 70 साल के बुज़ुर्ग को कशलेस भुगतान कैसे करना है,समझाना !
आज के नए नेताओं में इतना माद्दा नहीं की वे अपने नेताओं से प्रति प्रश्न कर सकें, उन्हें यह अवधारणा समझा सकें !
आज के नेता,- व्यापारी, साहूकारों और ठेकेदारों के बिना राजनीति कर ही नहीं सकते जो सामाजिक प्रतिशत में 10% आधार रखने वाली जातियों से आते हैं
और यदि राजनैतिक पार्टियाँ मज़दूरों ग़रीबों को व्यापारी और ठेकेदारों बनाती हैं (जो 90% दलित या आदिवासी होते हैं) तो उनका समाज ही उन दलित व्यापारी और ठेकेदारों को तिरस्कृत कर देता है ; वह सोचने लगता है कि यह हमारे समाज के नाम का कमा रहा है और बड़ी गाड़ियों में घूम रहा है !
उद्धरण : हीरा सिंह मरकाम जैसे कई नेता हैं जो धन की कमी से हारते हैं पर अपने क्षेत्रों में ग़ज़ब की पकड़ रखते हैं !
दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश के दसियों नेता हैं जो पर्याप्त धन होने के बाद भी स्वजनो द्वारा हराए जाते हैं !
समस्या यही है कि इन नेताओं को 90% दलित, आदिवासी और पिछड़े दिखते हैं पर 10% अगड़े नहीं दिखते जो इन आर्थिक पिछड़ों की आजीविका का साधन हैं ; बिलकुल वैसे ही जैसे अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज आज देश की अर्थव्यवस्था को थामे है वैसे ही ये 10% से भी कम सवर्ण गाँव की अर्थव्यवस्था को थामे हैं !!
जब आपके राष्ट्रीय नेता बिना अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज के बिना चुनाव नहीं लड़ सकते तो क्या स्थानीय प्रत्याशी मलगुज़ारो - ठेकेदारों दाऊ लोगों से विरोध कर कर चुनाव लड़ सकते हैं ?
चलिए आप यह भी कोशिश कर ले की हम इन 90% में से कुछ को मलगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ बना देते हैं तब भी क्या होना है ?
यह 90% आर्थिक पिछड़े हुए मतदाता उन अपनी ही जाति के मालगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ को अगले चुनाव में अपनी दलाली करने वाला, समाज द्रोही मान कर हरा देंगे !
छत्तीसगढ़ में कर्मा ताक़तवर हुए वे हार गए, बलिराम ताक़तवर हुए वे हार गए !
हर बार अगर आप ग़रीब प्रत्याशी को टिकिट दोगे तो भी उसे मदद तो 10% लोगों की ही चाहिए होगी ?
इसीलिए जातिगत विघटन से ज़्यादा फ़ायदे मंद सौदा सम्पूर्ण राष्ट्र में आर्थिक विषमता है (उत्तर प्रदेश और बिहार में भी) और यह अब मोदी का अगला क़दम होगा !
इसकी काट मुझे नहीं लगता किसी विपक्षी के पास अभी है !!

रविवार, 7 अगस्त 2016

भारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम)

भारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम)

मैंने एक फौरी अध्यन किया भारतीय पौराणिक इतिहास का !
बड़ा अजीब लगा - समझ में नहीं आया यह है क्या ?
यह परम्परायें जीवित कैसे थी आज तक ?
और आज इनके कमजोर होने के कारण कैसे परिवार टूट रहे हैं ?
भारतीय समाज में प्रेम का अभूतपूर्व स्थान है पर रोमांस का कोई स्थान नहीं रहा ?
हरण और वरण की परंपरा रही पर परिवार छोड़ कर किसी से विवाह की परंपरा नहीं रही !
हरण की हुयी स्त्री उसके परिवार की हार का सूचक थी और वरण की हुयी स्त्री खुद अपना वर चुनती थी पर कुछ शर्तो के साथ पूरे समाज की उपस्तिथि में !
रोमांस की कुछ घटनाएं कृष्ण के पौराणिक काल में सुनने में आती हैं पर उन में से किसी भी घटना में कही भी विवाह का जिक्र नहीं है !
रुक्मणी हरण का जिक्र है ; मीरा के प्रेम का जिक्र है पर रोमांस के बाद विवाह का जिक्र मुझे कहीं देखने में नहीं मिला आपको यदि मिले तो अवश्य बतायें !
प्रेम, वात्सल्य का भरपूर उल्लेख है ; वचन और कर्तव्यपरायणता का भरपूर उल्लेख है !
गांधारी से ले कर सीता तक, कैकई से लेकर मंदोदरी तक के वचन का और राम से लेकर श्रवण कुमार तक, सीता से लेकर लक्ष्मण की पत्नी तक की कर्तव्यपरायणता हमें भरपूर देखने को मिलती है पर आज का रोमांस कहीं नहीं है !
शिव की पत्नी पार्वती का विवाह भी वरण ही माना जायेगा और पति के सम्मान में अग्नि स्नान कर्तव्य !!
शिव का तांडव प्रेम है पर अंग्रेजों का रोमांस तो बिलकुल नहीं !!
अविवाहित कन्या का किसी को देखकर पसंद कर लेना और फिर उसे पाने में जमीन आसमान एक कर देने का उदाहरण शिव और उमा के प्रसंग में मिलता है और भीष्म पितामह का आजीवन कुंवारा रहना भी कथाओं में है !!
पर कहीं भी समाज या परिवार की अनिक्षा से पुरुष के विवाह का प्रकरण नहीं मिलता !!
१ प्रकरण मिलता है सुभद्रा का पर सुभद्रा और उनके भाई ने कृष्ण को सुभद्रा हरण के लिए मनाया था !!
पत्नी भक्ति का भी १ प्रकरण मिलता है कालजयी कवि कालिदास का - पर उसे भी तिरस्कार की नज़रो से देखा गया !! (यही १ प्रकरण रोमांस का है)
भारतीय पौराणिक कथाओं में पत्नी प्रेम के १०० उदाहरण हैं और पति प्रेम के १००० पर पूरा पौराणिक काल आसक्त प्रेम (रोमांस) से शून्य है !!
विशुद्ध प्रेम के उदाहरण की अगर हम बात करें तो राम का सीता से, गांधारी का कौरव राज से ; शिव का उमा से दिखायी देता है पर यह प्रेम आसक्त नहीं है यह प्रेम कर्तव्य निष्ठ है, किसी ने जंगल जाना स्वीकार किया किसी ने आँखों पर पट्टी बंधी !!
किसी ने पिता के आदेश को माना और उसकी पत्नी ने भी इसे स्वीकार किया !
रावण ने अपनी पत्नी को दिया वचन निभाया और सीता को स्पर्श भी नहीं किया !
राम ने सीता हरण के अपराधी का कुल समेत नाश किया !
लक्ष्मण ने अपनी पत्नी की मर्यादा रखी और सूर्पनखा की नाक काट ली !
शिव ने तो पार्वती के प्रेम में श्रृष्ठि के विनाश की व्यवस्था कर ली ; जो सदैव सराहनीय है !!
कालिदास ही हुए हैं जिनके प्रेम को हम प्रेम नहीं रोमांस कह सकते हैं पर इस रोमांस के कारण उन्हें बड़ा अपयश भोगना पड़ा !!
रोमांस का अंग्रेजी तर्जुमा है - A feeling of excitement and mystery of love. This is some where near to lust. The indian Love one is with liabilities, sacrifices with feeling of care & love. The word excitement and mystery has not liabilities, sacrifices with feeling of care.
भारतीय पुरुष प्रेम कर सकता है और करता भी है ; पर यह प्रेम कई हिस्सो में बनता होता है ; यह आसक्त हो ही नहीं सकता !
यह पिता का प्रेम भी होता है, यह माँ के लिए भी होता है यह भाई और बहन के लिए भी होता है तभी तो परिवार संगठित होता है ?
सब साथ होते हैं तो ताकत होती है समस्याओं का प्रतिहार बेहतर होता है !
और जीवन भर का साथ होता था !!
अब आसक्त प्रेम है - जो पश्चिम से आ रहा है जिसमे आसक्ति है अपेक्षाएं है पर कर्तव्य नहीं हैं - इसमें अधिकार कोर्ट देता है - व्यवस्थाएं देता है की आधी संपत्ति का मालिकाना हक़ और जीवन भर भरण पोषण पर कर्तव्य का निर्धारण कोर्ट कैसे कर सकता है ?
इसी आसक्त प्रेम में रेखा जैसी सुंदरी की कई शादियां टूटती हैं और इसी आसक्त प्रेम में ऋतिक रोशन का तलाक़ होता है और यही आसक्त प्रेम सिल्क स्मिथा को आत्महत्या को मजबूर करता है !
इस आसक्त प्रेम से इतर समर्पित प्रेम की तलाश में सलमान कुवंरा है और आमिर इसी आसक्त प्रेम के लिए परफेक्शनिस्ट की तरह परफेक्ट लड़की की तलाश में लगे रहे जो मैडम राव के रूप में पूरी हुयी की नहीं ये वही जाने !!
अब उपसंहार यह है जिस भारतीय पुरुष के डीएनए में उनके पूर्वजो ने रोमांस छोड़ा ही नहीं है वह रोमांस कर कैसे सकता है ?
और जो इस आसक्त प्रेम को पाने की कोशिश करेगा उसे अगर कोई ज्यादा आकर्षण युक्त साथी प्राप्त हो तो वह क्या करे ?
संवैधानिक मान्यताएं कहती हैं की हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह की छूट है - और विवाह विच्छेदन की भी ! (यहाँ कोर्ट एक तरह से परिवार विखंडन और अनैतिकता को बाधा रहा है )
पिता की जवाबदारी पुत्र या पुत्री के लिए १८ साल है - पर इस मान्यता को कोई पुत्र/पुत्री या पिता नहीं मानता जबकि वैवाहिक कानूनों में सभी अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी विवेचना करते हैं और सभी इसके लिए लड़ते हैं ?
इसका कारण क्या है यह हमें सोचना पड़ेगा !
संविधान की रचना के पूर्व हर पत्नी पति की जवाबदारी होती थी . अब आधी स्त्रियां अपने भाई, पिता या अगले पति की जिम्मेदारियां होती हैं !
हर पुरुष की जिम्मेदारी उसका परिवार होता है ; पर अब इसमें उसकी एक्स और आने वाली वाई भी जुड़ गयी है अब रिश्ते सौदे हो गए हैं ; ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा अमीर इसकी प्रमुख आर्यहतायें हैं !
BDUTT ने शायद ३ शादिये की - पर इसकी गारण्टी नहीं की वे अंतिम समय किसके साथ काटेंगी !!
न ही आमिर का और सैफ का कोई भरोसा है !
हाँ यह भी हो सकता है की ये अपना जीवन पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वृधाश्रम या नौकरों के भरोसे काटें !
जो हमारे पूर्वजो ने कभी नहीं काटा !!
शायद इसलिए की उन्होंने रोमांस नहीं किया या आसक्ति की तीव्रता के प्रभाव में आकर विवाह नहीं किये परिवार विच्छेद नहीं किये या उन्होंने किसी १ व्यक्ति के साथ साथ अपने परिवार को भी महत्त्व दिया !!
जो भी था पर वह समय बेहतर था !!
यह मेरे निजी विचार हैं और संशोधन के लिए सभी के सामने पेश हैं !!
अगर असहमत हों तो कमेंट करें अगर सहमत हों तो कोई बात ही नहीं है !!
Awasthi Sachinभारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम): मैंने एक फौरी अध्यन किया भारतीय पौराणिक इतिहास का !
बड़ा अजीब लगा - समझ में नहीं आया यह है क्या ?
यह परम्परायें जीवित कैसे थी आज तक ?
और आज इनके कमजोर होने के कारण कैसे परिवार टूट रहे हैं ?
भारतीय समाज में प्रेम का अभूतपूर्व स्थान है पर रोमांस का कोई स्थान नहीं रहा ?
हरण और वरण की परंपरा रही पर परिवार छोड़ कर किसी से विवाह की परंपरा नहीं रही !
हरण की हुयी स्त्री उसके परिवार की हार का सूचक थी और वरण की हुयी स्त्री खुद अपना वर चुनती थी पर कुछ शर्तो के साथ पूरे समाज की उपस्तिथि में !
रोमांस की कुछ घटनाएं कृष्ण के पौराणिक काल में सुनने में आती हैं पर उन में से किसी भी घटना में कही भी विवाह का जिक्र नहीं है !
रुक्मणी हरण का जिक्र है ; मीरा के प्रेम का जिक्र है पर रोमांस के बाद विवाह का जिक्र मुझे कहीं देखने में नहीं मिला आपको यदि मिले तो अवश्य बतायें !
प्रेम, वात्सल्य का भरपूर उल्लेख है ; वचन और कर्तव्यपरायणता का भरपूर उल्लेख है !
गांधारी से ले कर सीता तक, कैकई से लेकर मंदोदरी तक के वचन का और राम से लेकर श्रवण कुमार तक, सीता से लेकर लक्ष्मण की पत्नी तक की कर्तव्यपरायणता हमें भरपूर देखने को मिलती है पर आज का रोमांस कहीं नहीं है !
शिव की पत्नी पार्वती का विवाह भी वरण ही माना जायेगा और पति के सम्मान में अग्नि स्नान कर्तव्य !!
शिव का तांडव प्रेम है पर अंग्रेजों का रोमांस तो बिलकुल नहीं !!
अविवाहित कन्या का किसी को देखकर पसंद कर लेना और फिर उसे पाने में जमीन आसमान एक कर देने का उदाहरण शिव और उमा के प्रसंग में मिलता है और भीष्म पितामह का आजीवन कुंवारा रहना भी कथाओं में है !!
पर कहीं भी समाज या परिवार की अनिक्षा से पुरुष के विवाह का प्रकरण नहीं मिलता !!
१ प्रकरण मिलता है सुभद्रा का पर सुभद्रा और उनके भाई ने कृष्ण को सुभद्रा हरण के लिए मनाया था !!
पत्नी भक्ति का भी १ प्रकरण मिलता है कालजयी कवि कालिदास का - पर उसे भी तिरस्कार की नज़रो से देखा गया !! (यही १ प्रकरण रोमांस का है)
भारतीय पौराणिक कथाओं में पत्नी प्रेम के १०० उदाहरण हैं और पति प्रेम के १००० पर पूरा पौराणिक काल आसक्त प्रेम (रोमांस) से शून्य है !!
विशुद्ध प्रेम के उदाहरण की अगर हम बात करें तो राम का सीता से, गांधारी का कौरव राज से ; शिव का उमा से दिखायी देता है पर यह प्रेम आसक्त नहीं है यह प्रेम कर्तव्य निष्ठ है, किसी ने जंगल जाना स्वीकार किया किसी ने आँखों पर पट्टी बंधी !!
किसी ने पिता के आदेश को माना और उसकी पत्नी ने भी इसे स्वीकार किया !
रावण ने अपनी पत्नी को दिया वचन निभाया और सीता को स्पर्श भी नहीं किया !
राम ने सीता हरण के अपराधी का कुल समेत नाश किया !
लक्ष्मण ने अपनी पत्नी की मर्यादा रखी और सूर्पनखा की नाक काट ली !
शिव ने तो पार्वती के प्रेम में श्रृष्ठि के विनाश की व्यवस्था कर ली ; जो सदैव सराहनीय है !!
कालिदास ही हुए हैं जिनके प्रेम को हम प्रेम नहीं रोमांस कह सकते हैं पर इस रोमांस के कारण उन्हें बड़ा अपयश भोगना पड़ा !!
भारतीय पुरुष प्रेम कर सकता है और करता भी है ; पर यह प्रेम कई हिस्सो में बनता होता है ; यह आसक्त हो ही नहीं सकता !
यह पिता का प्रेम भी होता है, यह माँ के लिए भी होता है यह भाई और बहन के लिए भी होता है तभी तो परिवार संगठित होता है ?
सब साथ होते हैं तो ताकत होती है समस्याओं का प्रतिहार बेहतर होता है !
और जीवन भर का साथ होता था !!
अब आसक्त प्रेम है - जो पश्चिम से आ रहा है जिसमे आसक्ति है अपेक्षाएं है पर कर्तव्य नहीं हैं - इसमें अधिकार कोर्ट देता है - व्यवस्थाएं देता है की आधी संपत्ति का मालिकाना हक़ और जीवन भर भरण पोषण पर कर्तव्य का निर्धारण कोर्ट कैसे कर सकता है ?
इसी आसक्त प्रेम में रेखा जैसी सुंदरी की कई शादियां टूटती हैं और इसी आसक्त प्रेम में ऋतिक रोशन का तलाक़ होता है और यही आसक्त प्रेम सिल्क स्मिथा को आत्महत्या को मजबूर करता है !
इस आसक्त प्रेम से इतर समर्पित प्रेम की तलाश में सलमान कुवंरा है और आमिर इसी आसक्त प्रेम के लिए परफेक्शनिस्ट की तरह परफेक्ट लड़की की तलाश में लगे रहे जो मैडम राव के रूप में पूरी हुयी की नहीं ये वही जाने !!
अब उपसंहार यह है जिस भारतीय पुरुष के डीएनए में उनके पूर्वजो ने रोमांस छोड़ा ही नहीं है वह रोमांस कर कैसे सकता है ?
और जो इस आसक्त प्रेम को पाने की कोशिश करेगा उसे अगर कोई ज्यादा आकर्षण युक्त साथी प्राप्त हो तो वह क्या करे ?
संवैधानिक मान्यताएं कहती हैं की हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह की छूट है - और विवाह विच्छेदन की भी ! (यहाँ कोर्ट एक तरह से परिवार विखंडन और अनैतिकता को बाधा रहा है )
पिता की जवाबदारी पुत्र या पुत्री के लिए १८ साल है - पर इस मान्यता को कोई पुत्र/पुत्री या पिता नहीं मानता जबकि वैवाहिक कानूनों में सभी अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी विवेचना करते हैं और सभी इसके लिए लड़ते हैं ?
इसका कारण क्या है यह हमें सोचना पड़ेगा !
संविधान की रचना के पूर्व हर पत्नी पति की जवाबदारी होती थी . अब आधी स्त्रियां अपने भाई, पिता या अगले पति की जिम्मेदारियां होती हैं !
हर पुरुष की जिम्मेदारी उसका परिवार होता है ; पर अब इसमें उसकी एक्स और आने वाली वाई भी जुड़ गयी है अब रिश्ते सौदे हो गए हैं ; ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा अमीर इसकी प्रमुख आर्यहतायें हैं !
बरखा दत्त ने शायद ३ शादिये की - पर इसकी गारण्टी नहीं की वे अंतिम समय किसके साथ काटेंगी !!
न ही आमिर का और सैफ का कोई भरोसा है !
हाँ यह भी हो सकता है की ये अपना जीवन पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वृधाश्रम या नौकरों के भरोसे काटें !
जो हमारे पूर्वजो ने कभी नहीं काटा !!
शायद इसलिए की उन्होंने रोमांस नहीं किया या आसक्ति की तीव्रता के प्रभाव में आकर विवाह नहीं किये परिवार विच्छेद नहीं किये या उन्होंने किसी १ व्यक्ति के साथ साथ अपने परिवार को भी महत्त्व दिया !!
जो भी था पर वह समय बेहतर था !!
यह मेरे निजी विचार हैं और संशोधन के लिए सभी के सामने पेश हैं !!
अगर असहमत हों तो कमेंट करें अगर सहमत हों तो कोई बात ही नहीं है !!
Awasthi Sachin

बुधवार, 1 जून 2016

डरपोंक गांधी ?

कांग्रेस पर यह लेख मेरे स्वयं के विचार हैं और हर उस व्यक्ति, संस्था, संगठन एवं कंपनी को मैं इसे शेयर करने व छापने का अधिकार इस बाध्यता के साथ देता हूँ कि वे इस लेख की आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे !!
अवस्थी सचिन
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कांग्रेस भारत का सबसे पुराना राजनैतिक दल है ; वह दल जिसके सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी को भी उनके जीवित रहते उनके ही साथीयो ने चुनौती दी और गांधी ने उस चुनौती को खुले दिल से स्वीकार किया और नेताजी ने जिस चुनाव में गांधी के प्रत्याशी को पूर्ण बहुमत से हराया उस चुनाव को जीतने के बाद भी गांधी को दुखी देखकर नेता जी ने गांधी के चरणों में अपनी जीत की माला डाल दी थी !
जबकि वे पूर्ण बहुमत से चुने हुए अध्यक्ष थे !!
आज वही कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष का तो छोड़ दें प्रदेश और जिला अध्यक्ष का निष्पक्ष चुनाव नहीं करवा पा रही !
क्या हो गया है कांग्रेस को ?
नेहरु के सामने उनकी पार्टी में ही कई चुनौतियां आईं और वे हर बार उस चुनौतियों से लडे और जीते !
नेहरू के बाद इंदिरा ने काफी कमज़ोर शुरुवात की और इंदिरा ने उस मुकाम को हासिल किया जिस मुकाम पर लोग "इंडिया इस इंदिरा एंड इंदिरा इस इंडिया" का नारा लगाने लगे थे !
मोतीलाल से लेकर राजीव तक इस परिवार को कोई भीरु नहीं कह सका - पर आज देश की जनता राहुल और सोनिया को रणछोड़ दास या कायर की उपाधि देती है ?
रणछोड़ दास कैसे ?
यह बड़ा प्रश्न है पर उत्तर बड़ा छोटा सा है !!
वे अपने आपको गांधी नेहरु का वंशज कहते हैं पर उनका कलेजा पार्टी के भीतर भी चुनाव कराने का नहीं है !
                                                                               
आप किसी पार्टी से हों किसी विचार धरा को मानने वाले हों जरा आँख बंद करके विचार करें क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो स्कूल या कॉलेज में दोस्त न बना पाया जिसने कभी हिंदी अखबार न पढे, जो देश में बनी फिल्मों को न समझ पाया हो जिसने प्रेमचंद, रबींद्रनाथ को न पढ़ा हो - जो देश की संस्कृति से वाकिफ न हो वह क्या वह देश चला सकेगा ?
यह एक बड़ा भय है जिससे लड़ने की सोनिया राहुल ने कभी कोशिश नहीं की !
इसी डर के साये में सोनिया ने देश चलाया है और राहुल चलाने का सपना संजो रहे हैं !!
और किसी भी क्षत्रप की कद्दावर छवि ही एक ऐसी चीज़ है जिससे उनके गांधी परिवार को नींद में भी डर लगता है !
डर तो बहुत हैं प्रथम परिवार के मन में जिसे समय समय पर वे जाहिर भी करते रहते हैं - उनमे से कुछ प्रमुख डर हैं !
१- आतंक के सरदारों का डर !
२- कोई उनकी राजनैतिक सत्ता को चुनौती न दे दे इसका डर !
३- विदेश में बैठे बड़े धर्म गुरुओं का डर
४- अपनी राजनैतिक और सामाजिक हैसियत बचाए रखने का डर
५- अपनी अज्ञानता और अशिक्षा का डर
६- अपनी निजिता का डर
७- धर्म, शिक्षा, रिश्ते, बीमारी के उजागर हो जाने का डर
यही वे डर हैं जिनसे सोनिया या राहुल भागते रहे हैं !
और जो व्यक्ति अपने बचकाने डरो से भागे वो कैसे किसी का नेतृत्व कैसे कर सकता है ?
नेतृत्व करने की प्रथम प्राथमिकताओं से जिसे डर लगे वह देश का सबसे बड़ा नेता कैसे हो सकता है ?
कांग्रेस मुक्त भारत की सोच नयी नहीं है - इस सोच को अमली जामाँ पहनाने में सबसे पहला प्रयास "NTR" ने किया और तमिलनाडु को करीब करीब कांग्रेस मुक्त कर दिया !!
ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी ने किया - ममता ने आज के राष्ट्रपति प्रणब दा के खिलाफ झंडा उठाया और कांग्रेस ने और प्रथम परिवार ने उस पर ध्यान नहीं दिया - बस १९९७ में कांग्रेस का तृण मूल एकत्र हुआ और फूल और फल को उसने बंगाल से बाहर कर दिया, उस फूल और फल को जिसका पोषण खुद त्रण और मूल करते थे -
और नयी पार्टी बना डाली जिसका नाम रखा गया
"त्रण मूल कांग्रेस"
इसका शाब्दिक अर्थ था
घाँस/पत्ते और जड़ वाली कांग्रेस -
इस टी एम सी ने फल और फूल वाली कांग्रेस को बाहर कर दिया जिसका पोषण जड़ और पत्ते मतलब कार्यकर्ता करते थे - बंगाल नया कांग्रेस मुक्त प्रदेश बना !
ऐसा ही नारायण दत्त तिवारी के साथ हुआ उत्तर प्रदेश में और यही आंध्र में वाई एस आर के साथ हुआ !!
यही हो रहा है हर उस प्रदेश में जहाँ पार्टी की मूल (जड़) मज़बूत है और ऐसे क्षत्रप नेता है जिनकी जनता रुपी धरती पर पकड़ है !
पार्टी के प्रथम परिवार को कोई भी क्षत्रप मंजूर नहीं जो अपने दम पर वोट पा सके उन्हें लगता है की देश उन्हें इंदिरा और राजीव के नाम पर वोट देता है !
और पार्टी में कोई क्षत्रप होगा तो उससे प्रथम परिवार को चुनौती मिलेगी-
प्रथम परिवार को चिंतन करना चाहिए कि, जनता ने और कार्यकर्ताओं ने तो इंदिरा और राजीव को भी आइना दिखाया है !!
आज की परिस्तिथि में जनता कांग्रेस से इतनी दुखी नहीं है जितनी सोनिया राहुल और उनके संगी साथियों से है !
दिग्विजय से लेकर तेवारी तक, खुर्शीद, चिदंबरम और राहुल तक जितने भी कांग्रेस के स्पोक्स पर्सन दिखते और छपते रहे है सब से जनता हठधर्मिता की हद तक चिढ़ी हुयी है पर आज भी मनमोहन सिंह के लिए जनता के मन में कोई तीव्र अनादर की भावना नहीं है !
आज कांग्रेस के त्रण मूल कार्यकर्ता को चाहिए की वह अपना स्वयं का नेता खुद चुने और ऐसे नेताओं से मुक्ति पाएं जो हवेलियों के अंदर से राजनीति करते हैं !
आज जरूरत है फिर उस सोच और हिम्मत की जो इंदिरा के पास थी !!
आज जनता नहीं चाहती की हमें वो लोग नेतृत्व दे जिनमे खुद छाती ठोंक के बात करने का माद्दा नहीं है !!
आज जरूरत है पूरे देश में कांग्रेस के क्षत्रपों को एकत्र करने की और एक बिलकुल नयी पार्टी खड़ा करने की !!
जिसमे देश के कद्दावर क्षेत्रीय जननायक हों जो हर उम्र,धर्म और जाति का नेतृत्व करें और जो संकल्प ले की वे मजबूर जनता और मानव मात्र के लिए काम करेंगे देश के लिए काम करेंगे न की तुष्टिकरण और निजी लाभ एवं किसी परिवार ऐ ख़ास के लिए !!
तो शायद कांग्रेस फिर पुराणी प्रतिष्ठा पा सके और उन युवा और अधेड़ कोंग्रेसियो का भविष्य उज्जवल हो जाए जो दशकों से संघर्षरत हैं !!
धन्यवाद
अवस्थी सचिन "जबलपुर"
९३०००३०९०३ / ८९८९४२८८१९