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समष्टि और विश्व

  #सुधार की #प्रक्रिया का #मुख्य सूत्र #क्रमिक सुधार  है। और इसका #सार्वभौमिक #लक्ष्य #संपूर्ण #शोधन ही होता है... यह #मानव के #स्वास्थ्य का सुधार हो या #प्रकृति या #व्यवस्था का सुधार।। परंतु #जीवित वस्तुओ में #संपूर्ण सुधार #असंभव है, कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है, परंतु #व्यवस्थागत सुधार संभव है। हर सुधार #समष्टि के हित (सभी के लाभ) में हों यही आवश्यक है; #व्यष्टि (व्यक्तिगत) का चिंतन आत्म उत्थान और अनुशासन हेतु होना चाहिए।। #वामपंथ और #अंग्रेजियत ने करोड़ों की जिंदगी नर्क कर रखी है। उन्होंने जिस व्यवस्था का निर्माण किया है वह व्यवस्था #व्यष्टी के हित को #प्राथमिकता देती है और समष्टि के हित को #नजरंदाज करती है।। यह मानती है कि  #व्यक्तिक #धन और #सुख प्राप्ति हेतु पूर्ण विश्व और समाज को कष्ट दिया जा सकता है, सैकड़ों जगह यह #कानूनी भी है। भोजन और खाद्य श्रृंखला से लेकर वस्त्र, स्वास्थ्य और रहवास तक की व्यवस्था में किसी एक व्यक्ति, संस्था या देश के #अधिलाभ का ही चिंतन है, यह चिंतन स्थापित और व्यवस्थित रहे इसीलिए ही तो हम #युद्धरत, #संघर्षरत और #तनावग्रस्त हैं।। कहीं भी जाइ...

ब्राह्मिक और अब्राहमिक मान्यताएं और पर्यावरण।।

  मेरी शुद्ध जिज्ञासा है कि #अब्राहमिक शब्द क्या #ब्रह्मिक का विरोधाभासी है? या यह शब्द #A_Brahmik है? हिंदी में - #ब्रम्हत्व से परे या #ब्रह्म से परिपूर्ण ? प्रश्न व्याकरण का है पर #भयंकर #धार्मिक है? #सनातन और #हिंदुस्तान को जितना मैंने समझा है, वह इस #ब्रह्मांड का #सार्वभौमिक #वैज्ञानिक संविधान है, जिसके पालन किए बिना पृथ्वी हमें ज्यादा बर्दाश्त नहीं करेगी। वह विद्रोह में कांप जाएगी, जल प्लावन कर देगी, अन्न और प्राणवायु हमसे छीन लेगी। क्यों #जलप्लावन से प्रलय का, हर #धर्म में वर्णन है? अब नासा कहता है की #ग्लोबल_वार्मिंग से प्रलय संभव है... ऐसा क्यों?  यह सब हम जानते हैं पर मानते नहीं? ब्रह्म का #सिद्धांत तो हम जानते हैं,  पर मानना नहीं चाहते।  हमे समझना चाहिए कि सभी जीवों में भी वही #ब्रह्म है जो हम में है। वही चेतन है जो हम में है। इसी का एक सरल रूपांतरण, #वसुधैव_कुटुंबकम् है, जबकि मुझे लगता है कि इसका सत्य रूपांतरण #शिवोहम, अहम_ब्रह्मास्मि या कण कण में शंकर की अवधारणा है। यही वह मूल सिद्धांत है जो #परमाणु_निरस्त्रीकरण, #युद्ध और #विकसित_देशों के #विकासशील_देशों...

वर्ण व्यवस्था, आर्य समाज और भारत

वर्ण व्यवस्था : #अद्भुत सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था है। यह पर्यावरण के लिए भी उपयुक्त है और मानव के लिए भी। वर्ण व्यवस्था छिन्न भिन्न करके ही #औद्योगिकरण आया, अगर वर्ण व्यवस्था न छिन्न भिन्न हुई होती तो क्या  कोई अपना व्यापार और रोजगार छोड़ फैक्ट्रियों में #मजदूर बनता? आज 25 साल की उम्र तक पढ़ने के बाद कोई आर्किटेक्ट या इंजीनियर बनता है। वर्ण व्यवस्था में यह पढ़ाई 12 साल की उम्र में घर पर ही पिता की सोहबत में पूर्ण हो जाती थी। #डीएनए में #जातिगत ज्ञान होता था तो,  लोग जल्द सीखते थे, हर जाति को उसके जातिगत ज्ञान का सही उपयोग करने की कला उसके पिता के डीएनए से मिलती थी। बिल्कुल वैसे ही जैसा #अल्सेशियन को सूंघने की शक्ति, ग्रे हाऊंड को उसकी स्पीड, पिट बुल और रॉटविलर को उसकी रक्षण की समझ। अंग्रेजो के #औद्योगिकरण को जरूरत थी, मजदूरों की और भारत में मजदूर बिना वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न किए मिलना संभव न था। तो अंग्रेजो ने कुछ व्यवस्थाएं दी, AO ह्युम हो या दयानंद जी या सुवर खाने और शराब पीने वाले जिन्ना। इन्हे अंग्रेजो ने पैदा ही इसलिए किया क्योंकि वे वर्ण व्यवस्था और #सनात...

सनातन और संविधान - परिवार का क्या?

#Genesis कहती है कि #एडम को #ईव ने उकसा कर वर्जित फल खाने मजबूर किया ।। #मतबल मर्द से अपराध करवाने का कार्य महिलाओं ने हो शुरू किया 😂और इस अपराध की सजा ये दोनो समान रूप से आज तक भोग रहे हैं 🙏 #शायद इसी बात से सीख लेकर अंग्रेजो का #संविधान बना और वह कहता है कि पति या पत्नी, पिता या पुत्र, भाई या बहन के किए गए पापो की सजा उसके काउंटर पार्ट या परिवार को नहीं दी जा सकती... 😂 यहीं से समस्या शुरू हुई है... ईश्वरीय न्याय या #सनातन कहता है, कि परिवार के एक सदस्य का किया गया अपराध पूरे परिवार को झेलना चाहिए... इससे बहुत से फायदे थे, सबसे पहला फायदा, परिवार के लोग ही अपने लोगो पर नियंत्रण रखते थे, संगठित रहते थे, इसे कुटुंब कहते थे, इसीलिए अपराध कम थे। लोग उस घर में शादियां ही नहीं करते थे जिन परिवारों के लोग अपराधी या अनैतिक थे। वामपंथ और अंग्रेजी विचारधारा (संविधान) कहती है, जिससे शादी करना है उसे देखो, उसके बाप या भाई से क्या लेना देना? कोई अपराधी है उसे रोको मत, डराओ मत उसका हिसाब कानून करेगा, आप किसी को रोकने के अधिकारी नहीं है उसके लिए पुलिस है न... #संविधान कहता है, परिवार, संस्थान, सम...

भारत और भांग

#सनातन में कुछ भी #अवैज्ञानिक नहीं है, अगर आपको सनातन में कुछ अवैज्ञानिक लगता है तो उस पर या तो शोध नहीं हुआ है या वह आपके IQ से बाहर की चीज है। मैं काम कर रहा हूं एक ऐसे विषय पर भगवान शिव को प्रिय है, जिसको वेद में पांच पवित्र पौधो में स्थान प्राप्त हैं, जिसे लोग सस्ते नशे से जोड़ते हैं और जिसे औद्योगिकरण और पूंजीवाद ने बदनाम किया है। हाँ मैं काम कर रहा हूं भांग पर... #सनातनियो को जानना चाहिए की #शिवप्रिया #विजया #भांग #Cannabis #Hemp असल में कितनी उपयोगी और क्यों यह आज शिव को अप्राप्त है? नई दिल्ली 1985 स्थान #संसद भवन... राजीव गांधी के नेतृत्व में 403 सदस्यों वाली कांग्रेस में एनडीपीएस एक्ट के विरोध में लगातार स्वर मुखर हो रहे थे, हिंदू सांसद शिव प्रिया को शिव से दूर करना नहीं चाहते थे और राजीव, रोनाल्ड रीगन के अति दबाव में थे। अंतत: अपनी ही पार्टी के सांसदों से परेशान होकर राजीव गांधी ने कांग्रेस के चीफ व्हिप गुलाम नबी आजाद को आदेश दिया की एनडीपीएस एक्ट की वोटिंग पर व्हिप जारी करो तब जा कर पास हुआ यह एक्ट... और इस तरह भगवान शिव से शिव प्रिया विजया भांग छीन ली गई। और देश की सरकार ने...

मनु स्मृति में दंड का प्रावधान

जय गुरुदेव 🙏 विचारिये जितना ज्ञान जितना अधिकार उतना दंड, आज के वैकल्पिक ब्राह्मणों को 100 गुना दंड मतलब सोनिया और उनके पुत्र को सामान्य व्यक्ति से 100 गुना दंड - यह उचित है या अनुचित ? #वैकल्पिक_ब्राह्मण कौन? १- मंत्री, विधायक, सांसद, पार्षद और पंच सरपंच 2- न्यायाधीश 3- सभी प्रशासनिक अधिकारी सोचिए इस एक नियम से राष्ट्र में क्या बदलेगा? क्या मनुस्मृति उचित नहीं 🙏 #स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज 'मनुस्मृति' के ये महत्वपूर्ण श्लोक .. "अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च॥ ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्। द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः॥" (अध्याय 8, श्लोक संख्या 337/338) . अर्थात्, "चोरी जैसा कर्म करने पर राजा को चाहिए कि वह शूद्र को उस वस्तु के मूल्य का आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना, क्षत्रिय को बत्तीस गुना अर्थदण्ड दे। ब्राह्मण को चौसठ गुना या पूरा सौ गुना दण्ड दे। जो चोरी आदि कृत्यों के बारे में जितना ज्यादा जानता हो, उसे उतने भाग में दण्ड दे, किन्तु ब्राह्मण के विवेकी होने के...

सामाजिक संरचना, टिकाऊ जीवन और संवैधानिक संस्थाएं

आज का प्रश्न ✔️ १- क्या स्त्री और पुरुष, गाय और बैल या शेर और शेरनी एक बराबर हो सकते हैं? २- क्या दोनो की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक क्षमताएं व कार्यशैली समान हो सकती है? 3- क्या वे एक परिस्तिथि में एक समान निर्णय ले सकते हैं? प्रश्न का उत्तर #हाँ_या_न में देना हो तो उत्तर न में ही आएगा। पर कुछ लोग लेकिन, किंतु, बट, परंतु का उपयोग कर घंटो टाइम पास कर सकते हैं पर यह वे भी जानते हैं कि यह लेकिन और किंतु व्यर्थ की बकवास के सिवा कुछ नहीं है। नर प्रजातियें जो पशु योनि से जन्म लेती हैं स्त्री के साथ वैसा ही बर्ताव करती हैं जैसा पुरातन पुरुष। ईश्वर ने भी महिलाओं को, बच्चो समाज और परिवार के लिए #समर्पित बनाया है और पुरुषों को #उच्छंखल । ऐसा क्यूँ? मानव इतिहास में समाजीकरण एक वृहद विषय है। कोई भी पशु (मानव, पशुश्रेष्ठ है) चाहे वह स्त्री हो या पुरुष स्वावलम्बी होता है, पर महिला पशु स्वावलम्बी से ज्यादा होती है, वह बच्चों के उदरपोषण, सुरक्षा और उन्नयन के लिए भी समर्पित होती है। जबकि पुरुष पशु उच्छ्रंखल होता है वह स्वार्थी और कामुक होता है। मानव सामाजिक जीवन मे यह क्रम टूटा है इसे ट...

सनातन का कोरोना कनेक्शन

इन पर ध्यान दें : 👇 नमस्ते छुआछूत सोला वानप्रस्थ सूतक दाह संस्कार शाकाहार समुद्र पार न करना विदेश यात्रा के बाद पूरा एक चन्द्र पक्ष गांव से बाहर रहना घर मे आने से पहले हाँथ पैर धोना बाथरूम और टॉयलेट घर के बाहर बनवाना वैदिक स्नान की विधि और इसे कब कब करने है यह परंपरा ध्यान दें, हमारे ईश्वर के स्वास्थ्य खराब होने पर उनकी परिचर्या #यह वे चीज़े हैं जो मुझे याद आ रहीं हैं। आप बुजुर्गो से पूछेंगे तो और भी चीजे आपको मिलेंगी। यह हम भूल चुके हैं क्योंकि एन्टी बायोटिक, साबुन, और सेनिटाइजर बाजार में आ गए और औद्योगिक क्रांति को  मानवीय संसाधनों की जरूरत थी। आज हमें फिर वही परम्पराए नाम बदल बदल कर याद दिलाई जा रहीं है। #सोशल_डिस्टेंसिंग #क्लींलिनेस बुजुर्गो की कम इम्युनिटी आदि आदि। वानप्रस्थ आश्रम का उद्देश्य ही यह था कि वायरस बुजुर्गो पर जल्द प्रश्रय पा जाता है, फिर मजबूत होकर जवानों पर हमला करता है, इसलिए कमजोर इम्युनिटी के लोगो को वन भेज दिया जाता था।। निष्कर्ष : आना दुनिया को वहीं है जहां से हम चले थे। यही सनातन है। यह प्रकृति का संविधान है। #स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज