'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है। मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...