शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

छत्तीसगढ़ की राजनीती में हाथी की चाल........


मेरे मित्र लगातार ऑरकुट और निजी चर्चाओं में प्रश्न करते रहें है कि
आज के दौर में बा सा पा का भविष्य क्या है ?
छत्तीसगढ़ के आने वाले चुनाव में बा सा पा का क्या योगदान रहेगा?
कांसी राम जी के बाद मायावती बहन का क्या भविष्य होगा?
क्या बा सा पा कांग्रेस को नुकसान पहुँचायेगी ?
मैं भी इस विषय पर काफी समय से लिखना चाह रहा हूँ........
आज के परिद्रश्य में बा सा पा के वैचारिक स्तर में काफी सुधार हुआ है.
पार्टी जातिगत विद्वेष से ऊपर उठ कर सामाजिक और राष्ट्रीय सौहद्रता कि बात कर रही है. कुछ समय पूर्व तक
तिलक तराजू और तलवार.
इनको मरो जूते चार.
कि विचार धारा वाली मायावती अब ब्राह्मण. बनिया और ठाकुरों को अच्छे पदों पर बैठा रही है, उनका सम्मान कर रही है.
बा सा पा पर कभी भी धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप नहीं लगा न ही मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्म परिवर्तन का ही आरोप लगा है.
बहुजन समाज पार्टी पर सिर्फ १ आरोप लगता था कि पार्टी जातिगत वैमनस्यता फैलाती है जो अब अपरिहार्य है ......
आज के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो बा सा पा एक मात्र ऐसी पार्टी दिखती है जो पूर्णतः धर्म निर्पेक्ष्य, सामाजिक, धार्मिक और जातिगत समरसता में विश्वास करती है.
उ.प्र में पार्टी इन्ही कारणों से पूर्ण बहुमत में आई है.
३६ गढ़ में बा सा पा का कोई बड़ा राजनैतिक संगठन नहीं है, पार्टी के पास चुनाव हेतु बड़ा फंड भी नहीं है फिर भी पार्टी का भविष्य आने वाले चुनाव में उज्जवल है.
ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले चुनाव में मायावती जी किंग मेकर की भूमिका निभाएं.
कुछ पाठकों को मेरी बात अतिशयोक्ति लग सकती है, परन्तु ऐसा है नहीं.
आने वाले चुनाव में भा जा पा और कांग्रेस की गुट बाजी सबको दिखाई दे रही है.
दोनों दल इस से उबरने की कोशिश कर रहे है, यह आंशिक संभव हो सकता है पूर्णतः संभव नहीं है.
और बा सा पा इन्ही दलों पर नज़रें लगाये बैठी है, असंतुष्ट उम्मीदवारों को टिकिट देकर
बा सा पा ,भा जा पा और कांग्रेस को मुसीबत में डाल सकती है......
बा सा पा के लिए छत्तीसगढ़ में कोई भी पार्टी अछूत नहीं है , वह जिसको भी सरकार बनाने कि स्थिति में पायेगी उसके साथ हो जायेगी.
छत्तीस गढ़ के आसन्न चुनावों में मुझे लगता है बा सा पा १० के आस पास सीट जीतेगी.
हाथी भा जा पा और कांग्रेस दोनों को नुकसान पहुँचायेगा,
जिस पार्टी में ज्यादा असंतोष होगा, ज्यादा बागी उमीद्वर होंगे उसे ज्यादा नुकसान होगा.
कांशीराम जी के बाद दलित प्रधानमंत्री बनने का सपना मुझे लगता है मायावती पूर्ण करेंगी. उनका भविष्य उज्जवल है.

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

ब्राह्मणत्व Vs जंगलराज

होली और भांग : भंग की तरंग में मैने स्वप्न देखा - जो नीचे वर्णित है - ध्यान से पढ़ें इस व्यंग को ।।
4 गिलास ठंडाई, 2 चम्मच माज़ूम और 1 पाँव भांग के पकौड़े के बाद जब सच्चिदानंदन जी महाराज सोये तो उन्हें एक भयानक प्रजातान्त्रिक स्वप्न दिखा।

दृश्य 1 - 
घमासान चल रहा है कहीं जाट लड़ रहे हैं, कहीं पटेल युद्ध कर रहे हैं, कहीं देश द्रोही नारे लग रहे हैं तो कहीं, नेता जानवरो को पीट रहे हैं तो कहीं नेता पुत्र बलात्कार कर रहे हैं, कहीं हत्या और कुटिलता के प्रपंच रचे जा रहे हैं, कहीं नकली साधू जटा धारी चिलम चढ़ाये बैठे हैं।
दृश्य 2 - 
1 ब्राह्मण सफ़ेद धोती पहने चुटिया रखे खुले तन से बहते जल में सूर्य को अर्घ दे धीरे धीरे बाहर निकल रहा है ।

मैं - उस ब्राह्मण को रोक कर बैठ जाते है और पूछते हैं - महाराज ये समाज में हो क्या रहा है?
आप सूर्य उपासना कर रहे हो और देश जल रहा है, आग लगी है देश में ।

ब्राह्मण मुस्कुराये - कह उठे राज मिस्त्री को, टीवी मेकेनिक का काम दोगे तो ऐसा होगा ही।
वो रांगे की जगह सीमेंट और मल्टी मीटर की जगह साहुल तो लगाएगा ही।
अगर मिस्त्री कुछ करता हुआ न दिखेगा तो उससे दिहाड़ी कौन देगा - काम गलत हो या सही पैसे तो काम करने के ही मिलते हैं।
वही हो रहा है -
सभी को पैसे चाहिए ताकत चाहिए- चाहे अराजकता से ही क्यों न मिले पर पैसे तो सबको चाहिए ।।
पुराने समय में जो नियम बनाता और राज चलाता था, वो धोती पहनता था सूत की, कन्द मूल खाता था, जमीन पर सोता था, आभूषण के नाम पर एक चुटिया होती थी सर पर ।
अन्न भिक्षा से आता था, तो जब विलासिता की अनुमति ही नहीं थी, तो व्यक्ति व्यभिचार से भ्रष्टाचार से या अनाचार से क्या पायेगा ?
जब पाने को कुछ है ही नहीं तो डकैती के लिए शस्त्र क्यों जमा करेगा - मतलब गुंडे, आतंकी और नक्सली क्यों पालेगा?
पाने के लिए उसके पास सिर्फ 1 चीज़ बची थी, प्रतिष्ठा तो उसे पाने के लिए वो नए आदर्श गढ़ता था, अपनी सहनशक्ति और ज्ञान की सीमा बढ़ाता था।

तुम लोगो ने ये आदर्श, त्याग को मजाक बना लिया है तो तुम्हे इस विध्वंस के अलावा मिलेगा क्या ?

दृश्य 3 -
कन्हैया भाषण दे रहा है, संविधान हमें बोलने की आज़ादी देता है, बाबा साहब ने हमें बोलने की आज़ादी दी, संविधान दिया ।

दृश्य 4 - 
मैं - ब्रम्हदेव, देश संविधान के आधार पर चल रहा है, बाबा साहब ने इसे बनाया था - इसमें तो ऐसा कोई नियम नहीं जैसा आप बता रहे है नेताओ को मोटी तनख्वाह मिलती है - जज को सब कुछ मिलता है।

ये भिक्षा क्यों मांगेंगे ?

और पुराने समय में भी तो अपनों को फायदा दिया जाता था, एकलव्य को शिक्षा इसी लिए तो नहीं दी गयी?

ब्रह्मदेव - संविधान में बदलाव होते हैं, पुराना हटा दिया जाता है नया संस्करण छपता है।
मनु स्मृति से लेकर गीता तक अपमानित होती है, जिसे हज़ारो साल तक नहीं बदला गया ।

ऐसा क्यों ?

स्वार्थवश ही न, कहीं वोट का कहीं नोट का स्वार्थ ?

एकलव्य को नहीं पढ़ाने का कारण, पात्र और कुपात्र है ।
जैसे सेना या पुलिस में भर्ती के समय मनोविज्ञानिक परीक्षा होती है वैसा ही शस्त्र विद्या के लिए भी थी ।

पुलिस में अति गुस्सैल या अति भोले को नौकरी देने से जो नुक्सान होते हैं वही कुपात्र को उस समय शस्त्र विद्या देने में थे, यह एक शिक्षक का व्यक्तिगत निर्णय था।
मैं : ये तो जातिगत निर्णय था गुरु जी ?

गुरु जी : बेटा यह परिस्तिथियों को देखने की समझ है,
जातियो का अस्तित्व कभी मिट नहीं सकता - इसे मिटाना असंभव है - आज भी भारत वर्ष में चार जातियां हैं, और उनके छुआ छूत को संविधान भी नहीं रोक सकता ।
1 - बी पी एल 2- ऐ पी एल 3- माध्यम वर्ग 4 - अमीर
इनमे भी कई अंतर जातियां हैं - मारुती वाली, हौंडा वाली, बी एम् डब्लू वाली और रोल्स रॉयस वाली ।

आज ऐ पी एल या बी पी एल वाला दून स्कूल में पढ़ सकता है क्या ?
स्वर्वोत्म शिक्षा के लिए ऐसे ही एकलव्य भी राज गुरु के पास गया था, वह तो छुप छुपा के सीख भी गया कुछ आज तो तुम छुप छुपा के भी नहीं सीख सकते ?

मैं : गुरु जी पर बिना धन के दुनिया चलती कहाँ है, सबको तो धन ही चाहिए ?

गुरूजी : धन होना ही चाहिए, बिना लक्षमी के जीवन हो ही नहीं सकता - पर सरस्वती के बिना क्या जीवन संभव है ।
तुम जानते हो सरस्वती और लक्षमी में बैर है ।

शिक्षा - न्याय - विधायिका को पूर्ण रूप से धन और ऐश्वर्य से विरक्त होना चाहिए पर ऐसा है नहीं -
जब तक ये नहीं होगा तब तक जंगल राज़ ही चलेगा ।

ॐ शिव शम्भो ।

चलता हूँ बेटा नमाज़ का वक्त हो गया ।।
#स्वामीसच्चिदानंदनजी_महाराज

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मोदी का अगला क़दम : जातिगत विघटन नहीं अपितु आर्थिक विषमता का फ़ायदा उठाना है !!

दलित राजनीति हो समाजवाद या सर्वजन हिताय की अवधारणा लिए हुए देश - उनको चलाने का काम तो वही कर सकता है जो समर्थ हो !
किराने की दुकान चलाने वाले बनिए को कोई भी सरकार वह सुविधाएँ नहीं दे सकती जो टाटा या अम्बानी को देती है ; यह शास्वत सत्य है !
विचार करिए एक संवैधानिक संशोधन पर और उस किराना व्यापारी को अम्बानी बनाने की कोशिश करिए; और फिर उससे लाभ लेने की कोशिश करिए !
इस पूरी प्रक्रिया में 50 साल तो लगेंगे - और शायद अम्बानी भी ख़त्म हो जाए और किराना व्यापारी भी नया अम्बानी न बन पाए या बन भी जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है !
यही भारतीय राजनीति है - हम मंडला बालघाट और झबुआ के आदिवासियों को नेता बनाते हैं !ताक़त देते हैं बड़े बड़े भाषण देते हैं ; लाभ की योजनाएँ बनाते हैं और जब चुनाव आता है तो उसी आदिवासी के गाँव के लोग गाँव के सवर्ण मालगुजार से पूछ कर वोट देते है ; क्यूँकि उन्हें उसी मालगुज़ार की मज़दूरी करनी है ; वही उसे पैसे उधार देता है ; वही मदद करता है वह मालगुज़ार अगर चाहे तो मदद न कर आपको दुत्कार भी सकता है !
यही परम्परा रही है सदियों से ; यही व्यवस्थाएँ रहेंगी सदियों तक !
यही वह खाई है जो पहले जातियों के बीच थी अब अमीर और ग़रीब के बीच है !
मोदी की एक ख़ासियत रही है उनने जाति आधारित समाज विखंडन की बात नहीं की ; समाज को बाँटने की कोशिश की धनी और ग़रीब के आधार पर जिसके चलते "नोट बंदी" का सामाजिक विरोध नहीं हो पाया !
दलित और ब्राह्मण विरोधी अवधारणा का मूल श्रेष्ठता और तिरस्कार था; अब किसी को श्रेष्ठता और तिरस्कार की समस्या (यू पी बिहार और मध्यप्रदेश के रीवा जिले को छोड़कर) है ही नहीं !
अब सम्मान बड़ी गाड़ी बड़ा बंगला देखकर होता है और तिरस्कार झोपड़ी और आपकी औक़ात देखकर !
पहले भी समस्या थी जलन की अब भी यही समस्या है - पहले इसे ब्राह्मण और दलित के बीच संघर्ष माना जाता था अब यही अमीरो और ग़रीबो के बीच का संघर्ष है
यह समस्या तत्कालीन बुज़ुर्ग नेताओं की समझ से परे का मामला है ; यह बिलकुल वैसा ही है जैसे 70 साल के बुज़ुर्ग को कशलेस भुगतान कैसे करना है,समझाना !
आज के नए नेताओं में इतना माद्दा नहीं की वे अपने नेताओं से प्रति प्रश्न कर सकें, उन्हें यह अवधारणा समझा सकें !
आज के नेता,- व्यापारी, साहूकारों और ठेकेदारों के बिना राजनीति कर ही नहीं सकते जो सामाजिक प्रतिशत में 10% आधार रखने वाली जातियों से आते हैं
और यदि राजनैतिक पार्टियाँ मज़दूरों ग़रीबों को व्यापारी और ठेकेदारों बनाती हैं (जो 90% दलित या आदिवासी होते हैं) तो उनका समाज ही उन दलित व्यापारी और ठेकेदारों को तिरस्कृत कर देता है ; वह सोचने लगता है कि यह हमारे समाज के नाम का कमा रहा है और बड़ी गाड़ियों में घूम रहा है !
उद्धरण : हीरा सिंह मरकाम जैसे कई नेता हैं जो धन की कमी से हारते हैं पर अपने क्षेत्रों में ग़ज़ब की पकड़ रखते हैं !
दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश के दसियों नेता हैं जो पर्याप्त धन होने के बाद भी स्वजनो द्वारा हराए जाते हैं !
समस्या यही है कि इन नेताओं को 90% दलित, आदिवासी और पिछड़े दिखते हैं पर 10% अगड़े नहीं दिखते जो इन आर्थिक पिछड़ों की आजीविका का साधन हैं ; बिलकुल वैसे ही जैसे अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज आज देश की अर्थव्यवस्था को थामे है वैसे ही ये 10% से भी कम सवर्ण गाँव की अर्थव्यवस्था को थामे हैं !!
जब आपके राष्ट्रीय नेता बिना अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज के बिना चुनाव नहीं लड़ सकते तो क्या स्थानीय प्रत्याशी मलगुज़ारो - ठेकेदारों दाऊ लोगों से विरोध कर कर चुनाव लड़ सकते हैं ?
चलिए आप यह भी कोशिश कर ले की हम इन 90% में से कुछ को मलगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ बना देते हैं तब भी क्या होना है ?
यह 90% आर्थिक पिछड़े हुए मतदाता उन अपनी ही जाति के मालगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ को अगले चुनाव में अपनी दलाली करने वाला, समाज द्रोही मान कर हरा देंगे !
छत्तीसगढ़ में कर्मा ताक़तवर हुए वे हार गए, बलिराम ताक़तवर हुए वे हार गए !
हर बार अगर आप ग़रीब प्रत्याशी को टिकिट दोगे तो भी उसे मदद तो 10% लोगों की ही चाहिए होगी ?
इसीलिए जातिगत विघटन से ज़्यादा फ़ायदे मंद सौदा सम्पूर्ण राष्ट्र में आर्थिक विषमता है (उत्तर प्रदेश और बिहार में भी) और यह अब मोदी का अगला क़दम होगा !
इसकी काट मुझे नहीं लगता किसी विपक्षी के पास अभी है !!