शुक्रवार, 23 मार्च 2018

ब्राह्मणत्व Vs जंगलराज

होली और भांग : भंग की तरंग में मैने स्वप्न देखा - जो नीचे वर्णित है - ध्यान से पढ़ें इस व्यंग को ।।
4 गिलास ठंडाई, 2 चम्मच माज़ूम और 1 पाँव भांग के पकौड़े के बाद जब सच्चिदानंदन जी महाराज सोये तो उन्हें एक भयानक प्रजातान्त्रिक स्वप्न दिखा।

दृश्य 1 - 
घमासान चल रहा है कहीं जाट लड़ रहे हैं, कहीं पटेल युद्ध कर रहे हैं, कहीं देश द्रोही नारे लग रहे हैं तो कहीं, नेता जानवरो को पीट रहे हैं तो कहीं नेता पुत्र बलात्कार कर रहे हैं, कहीं हत्या और कुटिलता के प्रपंच रचे जा रहे हैं, कहीं नकली साधू जटा धारी चिलम चढ़ाये बैठे हैं।
दृश्य 2 - 
1 ब्राह्मण सफ़ेद धोती पहने चुटिया रखे खुले तन से बहते जल में सूर्य को अर्घ दे धीरे धीरे बाहर निकल रहा है ।

मैं - उस ब्राह्मण को रोक कर बैठ जाते है और पूछते हैं - महाराज ये समाज में हो क्या रहा है?
आप सूर्य उपासना कर रहे हो और देश जल रहा है, आग लगी है देश में ।

ब्राह्मण मुस्कुराये - कह उठे राज मिस्त्री को, टीवी मेकेनिक का काम दोगे तो ऐसा होगा ही।
वो रांगे की जगह सीमेंट और मल्टी मीटर की जगह साहुल तो लगाएगा ही।
अगर मिस्त्री कुछ करता हुआ न दिखेगा तो उससे दिहाड़ी कौन देगा - काम गलत हो या सही पैसे तो काम करने के ही मिलते हैं।
वही हो रहा है -
सभी को पैसे चाहिए ताकत चाहिए- चाहे अराजकता से ही क्यों न मिले पर पैसे तो सबको चाहिए ।।
पुराने समय में जो नियम बनाता और राज चलाता था, वो धोती पहनता था सूत की, कन्द मूल खाता था, जमीन पर सोता था, आभूषण के नाम पर एक चुटिया होती थी सर पर ।
अन्न भिक्षा से आता था, तो जब विलासिता की अनुमति ही नहीं थी, तो व्यक्ति व्यभिचार से भ्रष्टाचार से या अनाचार से क्या पायेगा ?
जब पाने को कुछ है ही नहीं तो डकैती के लिए शस्त्र क्यों जमा करेगा - मतलब गुंडे, आतंकी और नक्सली क्यों पालेगा?
पाने के लिए उसके पास सिर्फ 1 चीज़ बची थी, प्रतिष्ठा तो उसे पाने के लिए वो नए आदर्श गढ़ता था, अपनी सहनशक्ति और ज्ञान की सीमा बढ़ाता था।

तुम लोगो ने ये आदर्श, त्याग को मजाक बना लिया है तो तुम्हे इस विध्वंस के अलावा मिलेगा क्या ?

दृश्य 3 -
कन्हैया भाषण दे रहा है, संविधान हमें बोलने की आज़ादी देता है, बाबा साहब ने हमें बोलने की आज़ादी दी, संविधान दिया ।

दृश्य 4 - 
मैं - ब्रम्हदेव, देश संविधान के आधार पर चल रहा है, बाबा साहब ने इसे बनाया था - इसमें तो ऐसा कोई नियम नहीं जैसा आप बता रहे है नेताओ को मोटी तनख्वाह मिलती है - जज को सब कुछ मिलता है।

ये भिक्षा क्यों मांगेंगे ?

और पुराने समय में भी तो अपनों को फायदा दिया जाता था, एकलव्य को शिक्षा इसी लिए तो नहीं दी गयी?

ब्रह्मदेव - संविधान में बदलाव होते हैं, पुराना हटा दिया जाता है नया संस्करण छपता है।
मनु स्मृति से लेकर गीता तक अपमानित होती है, जिसे हज़ारो साल तक नहीं बदला गया ।

ऐसा क्यों ?

स्वार्थवश ही न, कहीं वोट का कहीं नोट का स्वार्थ ?

एकलव्य को नहीं पढ़ाने का कारण, पात्र और कुपात्र है ।
जैसे सेना या पुलिस में भर्ती के समय मनोविज्ञानिक परीक्षा होती है वैसा ही शस्त्र विद्या के लिए भी थी ।

पुलिस में अति गुस्सैल या अति भोले को नौकरी देने से जो नुक्सान होते हैं वही कुपात्र को उस समय शस्त्र विद्या देने में थे, यह एक शिक्षक का व्यक्तिगत निर्णय था।
मैं : ये तो जातिगत निर्णय था गुरु जी ?

गुरु जी : बेटा यह परिस्तिथियों को देखने की समझ है,
जातियो का अस्तित्व कभी मिट नहीं सकता - इसे मिटाना असंभव है - आज भी भारत वर्ष में चार जातियां हैं, और उनके छुआ छूत को संविधान भी नहीं रोक सकता ।
1 - बी पी एल 2- ऐ पी एल 3- माध्यम वर्ग 4 - अमीर
इनमे भी कई अंतर जातियां हैं - मारुती वाली, हौंडा वाली, बी एम् डब्लू वाली और रोल्स रॉयस वाली ।

आज ऐ पी एल या बी पी एल वाला दून स्कूल में पढ़ सकता है क्या ?
स्वर्वोत्म शिक्षा के लिए ऐसे ही एकलव्य भी राज गुरु के पास गया था, वह तो छुप छुपा के सीख भी गया कुछ आज तो तुम छुप छुपा के भी नहीं सीख सकते ?

मैं : गुरु जी पर बिना धन के दुनिया चलती कहाँ है, सबको तो धन ही चाहिए ?

गुरूजी : धन होना ही चाहिए, बिना लक्षमी के जीवन हो ही नहीं सकता - पर सरस्वती के बिना क्या जीवन संभव है ।
तुम जानते हो सरस्वती और लक्षमी में बैर है ।

शिक्षा - न्याय - विधायिका को पूर्ण रूप से धन और ऐश्वर्य से विरक्त होना चाहिए पर ऐसा है नहीं -
जब तक ये नहीं होगा तब तक जंगल राज़ ही चलेगा ।

ॐ शिव शम्भो ।

चलता हूँ बेटा नमाज़ का वक्त हो गया ।।
#स्वामीसच्चिदानंदनजी_महाराज

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मोदी का अगला क़दम : जातिगत विघटन नहीं अपितु आर्थिक विषमता का फ़ायदा उठाना है !!

दलित राजनीति हो समाजवाद या सर्वजन हिताय की अवधारणा लिए हुए देश - उनको चलाने का काम तो वही कर सकता है जो समर्थ हो !
किराने की दुकान चलाने वाले बनिए को कोई भी सरकार वह सुविधाएँ नहीं दे सकती जो टाटा या अम्बानी को देती है ; यह शास्वत सत्य है !
विचार करिए एक संवैधानिक संशोधन पर और उस किराना व्यापारी को अम्बानी बनाने की कोशिश करिए; और फिर उससे लाभ लेने की कोशिश करिए !
इस पूरी प्रक्रिया में 50 साल तो लगेंगे - और शायद अम्बानी भी ख़त्म हो जाए और किराना व्यापारी भी नया अम्बानी न बन पाए या बन भी जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है !
यही भारतीय राजनीति है - हम मंडला बालघाट और झबुआ के आदिवासियों को नेता बनाते हैं !ताक़त देते हैं बड़े बड़े भाषण देते हैं ; लाभ की योजनाएँ बनाते हैं और जब चुनाव आता है तो उसी आदिवासी के गाँव के लोग गाँव के सवर्ण मालगुजार से पूछ कर वोट देते है ; क्यूँकि उन्हें उसी मालगुज़ार की मज़दूरी करनी है ; वही उसे पैसे उधार देता है ; वही मदद करता है वह मालगुज़ार अगर चाहे तो मदद न कर आपको दुत्कार भी सकता है !
यही परम्परा रही है सदियों से ; यही व्यवस्थाएँ रहेंगी सदियों तक !
यही वह खाई है जो पहले जातियों के बीच थी अब अमीर और ग़रीब के बीच है !
मोदी की एक ख़ासियत रही है उनने जाति आधारित समाज विखंडन की बात नहीं की ; समाज को बाँटने की कोशिश की धनी और ग़रीब के आधार पर जिसके चलते "नोट बंदी" का सामाजिक विरोध नहीं हो पाया !
दलित और ब्राह्मण विरोधी अवधारणा का मूल श्रेष्ठता और तिरस्कार था; अब किसी को श्रेष्ठता और तिरस्कार की समस्या (यू पी बिहार और मध्यप्रदेश के रीवा जिले को छोड़कर) है ही नहीं !
अब सम्मान बड़ी गाड़ी बड़ा बंगला देखकर होता है और तिरस्कार झोपड़ी और आपकी औक़ात देखकर !
पहले भी समस्या थी जलन की अब भी यही समस्या है - पहले इसे ब्राह्मण और दलित के बीच संघर्ष माना जाता था अब यही अमीरो और ग़रीबो के बीच का संघर्ष है
यह समस्या तत्कालीन बुज़ुर्ग नेताओं की समझ से परे का मामला है ; यह बिलकुल वैसा ही है जैसे 70 साल के बुज़ुर्ग को कशलेस भुगतान कैसे करना है,समझाना !
आज के नए नेताओं में इतना माद्दा नहीं की वे अपने नेताओं से प्रति प्रश्न कर सकें, उन्हें यह अवधारणा समझा सकें !
आज के नेता,- व्यापारी, साहूकारों और ठेकेदारों के बिना राजनीति कर ही नहीं सकते जो सामाजिक प्रतिशत में 10% आधार रखने वाली जातियों से आते हैं
और यदि राजनैतिक पार्टियाँ मज़दूरों ग़रीबों को व्यापारी और ठेकेदारों बनाती हैं (जो 90% दलित या आदिवासी होते हैं) तो उनका समाज ही उन दलित व्यापारी और ठेकेदारों को तिरस्कृत कर देता है ; वह सोचने लगता है कि यह हमारे समाज के नाम का कमा रहा है और बड़ी गाड़ियों में घूम रहा है !
उद्धरण : हीरा सिंह मरकाम जैसे कई नेता हैं जो धन की कमी से हारते हैं पर अपने क्षेत्रों में ग़ज़ब की पकड़ रखते हैं !
दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश के दसियों नेता हैं जो पर्याप्त धन होने के बाद भी स्वजनो द्वारा हराए जाते हैं !
समस्या यही है कि इन नेताओं को 90% दलित, आदिवासी और पिछड़े दिखते हैं पर 10% अगड़े नहीं दिखते जो इन आर्थिक पिछड़ों की आजीविका का साधन हैं ; बिलकुल वैसे ही जैसे अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज आज देश की अर्थव्यवस्था को थामे है वैसे ही ये 10% से भी कम सवर्ण गाँव की अर्थव्यवस्था को थामे हैं !!
जब आपके राष्ट्रीय नेता बिना अम्बानी, अदानी, टाटा, रुइया या गोदरेज के बिना चुनाव नहीं लड़ सकते तो क्या स्थानीय प्रत्याशी मलगुज़ारो - ठेकेदारों दाऊ लोगों से विरोध कर कर चुनाव लड़ सकते हैं ?
चलिए आप यह भी कोशिश कर ले की हम इन 90% में से कुछ को मलगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ बना देते हैं तब भी क्या होना है ?
यह 90% आर्थिक पिछड़े हुए मतदाता उन अपनी ही जाति के मालगुज़ार - ठेकेदार और दाऊ को अगले चुनाव में अपनी दलाली करने वाला, समाज द्रोही मान कर हरा देंगे !
छत्तीसगढ़ में कर्मा ताक़तवर हुए वे हार गए, बलिराम ताक़तवर हुए वे हार गए !
हर बार अगर आप ग़रीब प्रत्याशी को टिकिट दोगे तो भी उसे मदद तो 10% लोगों की ही चाहिए होगी ?
इसीलिए जातिगत विघटन से ज़्यादा फ़ायदे मंद सौदा सम्पूर्ण राष्ट्र में आर्थिक विषमता है (उत्तर प्रदेश और बिहार में भी) और यह अब मोदी का अगला क़दम होगा !
इसकी काट मुझे नहीं लगता किसी विपक्षी के पास अभी है !!

रविवार, 7 अगस्त 2016

भारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम)

भारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम)

मैंने एक फौरी अध्यन किया भारतीय पौराणिक इतिहास का !
बड़ा अजीब लगा - समझ में नहीं आया यह है क्या ?
यह परम्परायें जीवित कैसे थी आज तक ?
और आज इनके कमजोर होने के कारण कैसे परिवार टूट रहे हैं ?
भारतीय समाज में प्रेम का अभूतपूर्व स्थान है पर रोमांस का कोई स्थान नहीं रहा ?
हरण और वरण की परंपरा रही पर परिवार छोड़ कर किसी से विवाह की परंपरा नहीं रही !
हरण की हुयी स्त्री उसके परिवार की हार का सूचक थी और वरण की हुयी स्त्री खुद अपना वर चुनती थी पर कुछ शर्तो के साथ पूरे समाज की उपस्तिथि में !
रोमांस की कुछ घटनाएं कृष्ण के पौराणिक काल में सुनने में आती हैं पर उन में से किसी भी घटना में कही भी विवाह का जिक्र नहीं है !
रुक्मणी हरण का जिक्र है ; मीरा के प्रेम का जिक्र है पर रोमांस के बाद विवाह का जिक्र मुझे कहीं देखने में नहीं मिला आपको यदि मिले तो अवश्य बतायें !
प्रेम, वात्सल्य का भरपूर उल्लेख है ; वचन और कर्तव्यपरायणता का भरपूर उल्लेख है !
गांधारी से ले कर सीता तक, कैकई से लेकर मंदोदरी तक के वचन का और राम से लेकर श्रवण कुमार तक, सीता से लेकर लक्ष्मण की पत्नी तक की कर्तव्यपरायणता हमें भरपूर देखने को मिलती है पर आज का रोमांस कहीं नहीं है !
शिव की पत्नी पार्वती का विवाह भी वरण ही माना जायेगा और पति के सम्मान में अग्नि स्नान कर्तव्य !!
शिव का तांडव प्रेम है पर अंग्रेजों का रोमांस तो बिलकुल नहीं !!
अविवाहित कन्या का किसी को देखकर पसंद कर लेना और फिर उसे पाने में जमीन आसमान एक कर देने का उदाहरण शिव और उमा के प्रसंग में मिलता है और भीष्म पितामह का आजीवन कुंवारा रहना भी कथाओं में है !!
पर कहीं भी समाज या परिवार की अनिक्षा से पुरुष के विवाह का प्रकरण नहीं मिलता !!
१ प्रकरण मिलता है सुभद्रा का पर सुभद्रा और उनके भाई ने कृष्ण को सुभद्रा हरण के लिए मनाया था !!
पत्नी भक्ति का भी १ प्रकरण मिलता है कालजयी कवि कालिदास का - पर उसे भी तिरस्कार की नज़रो से देखा गया !! (यही १ प्रकरण रोमांस का है)
भारतीय पौराणिक कथाओं में पत्नी प्रेम के १०० उदाहरण हैं और पति प्रेम के १००० पर पूरा पौराणिक काल आसक्त प्रेम (रोमांस) से शून्य है !!
विशुद्ध प्रेम के उदाहरण की अगर हम बात करें तो राम का सीता से, गांधारी का कौरव राज से ; शिव का उमा से दिखायी देता है पर यह प्रेम आसक्त नहीं है यह प्रेम कर्तव्य निष्ठ है, किसी ने जंगल जाना स्वीकार किया किसी ने आँखों पर पट्टी बंधी !!
किसी ने पिता के आदेश को माना और उसकी पत्नी ने भी इसे स्वीकार किया !
रावण ने अपनी पत्नी को दिया वचन निभाया और सीता को स्पर्श भी नहीं किया !
राम ने सीता हरण के अपराधी का कुल समेत नाश किया !
लक्ष्मण ने अपनी पत्नी की मर्यादा रखी और सूर्पनखा की नाक काट ली !
शिव ने तो पार्वती के प्रेम में श्रृष्ठि के विनाश की व्यवस्था कर ली ; जो सदैव सराहनीय है !!
कालिदास ही हुए हैं जिनके प्रेम को हम प्रेम नहीं रोमांस कह सकते हैं पर इस रोमांस के कारण उन्हें बड़ा अपयश भोगना पड़ा !!
रोमांस का अंग्रेजी तर्जुमा है - A feeling of excitement and mystery of love. This is some where near to lust. The indian Love one is with liabilities, sacrifices with feeling of care & love. The word excitement and mystery has not liabilities, sacrifices with feeling of care.
भारतीय पुरुष प्रेम कर सकता है और करता भी है ; पर यह प्रेम कई हिस्सो में बनता होता है ; यह आसक्त हो ही नहीं सकता !
यह पिता का प्रेम भी होता है, यह माँ के लिए भी होता है यह भाई और बहन के लिए भी होता है तभी तो परिवार संगठित होता है ?
सब साथ होते हैं तो ताकत होती है समस्याओं का प्रतिहार बेहतर होता है !
और जीवन भर का साथ होता था !!
अब आसक्त प्रेम है - जो पश्चिम से आ रहा है जिसमे आसक्ति है अपेक्षाएं है पर कर्तव्य नहीं हैं - इसमें अधिकार कोर्ट देता है - व्यवस्थाएं देता है की आधी संपत्ति का मालिकाना हक़ और जीवन भर भरण पोषण पर कर्तव्य का निर्धारण कोर्ट कैसे कर सकता है ?
इसी आसक्त प्रेम में रेखा जैसी सुंदरी की कई शादियां टूटती हैं और इसी आसक्त प्रेम में ऋतिक रोशन का तलाक़ होता है और यही आसक्त प्रेम सिल्क स्मिथा को आत्महत्या को मजबूर करता है !
इस आसक्त प्रेम से इतर समर्पित प्रेम की तलाश में सलमान कुवंरा है और आमिर इसी आसक्त प्रेम के लिए परफेक्शनिस्ट की तरह परफेक्ट लड़की की तलाश में लगे रहे जो मैडम राव के रूप में पूरी हुयी की नहीं ये वही जाने !!
अब उपसंहार यह है जिस भारतीय पुरुष के डीएनए में उनके पूर्वजो ने रोमांस छोड़ा ही नहीं है वह रोमांस कर कैसे सकता है ?
और जो इस आसक्त प्रेम को पाने की कोशिश करेगा उसे अगर कोई ज्यादा आकर्षण युक्त साथी प्राप्त हो तो वह क्या करे ?
संवैधानिक मान्यताएं कहती हैं की हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह की छूट है - और विवाह विच्छेदन की भी ! (यहाँ कोर्ट एक तरह से परिवार विखंडन और अनैतिकता को बाधा रहा है )
पिता की जवाबदारी पुत्र या पुत्री के लिए १८ साल है - पर इस मान्यता को कोई पुत्र/पुत्री या पिता नहीं मानता जबकि वैवाहिक कानूनों में सभी अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी विवेचना करते हैं और सभी इसके लिए लड़ते हैं ?
इसका कारण क्या है यह हमें सोचना पड़ेगा !
संविधान की रचना के पूर्व हर पत्नी पति की जवाबदारी होती थी . अब आधी स्त्रियां अपने भाई, पिता या अगले पति की जिम्मेदारियां होती हैं !
हर पुरुष की जिम्मेदारी उसका परिवार होता है ; पर अब इसमें उसकी एक्स और आने वाली वाई भी जुड़ गयी है अब रिश्ते सौदे हो गए हैं ; ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा अमीर इसकी प्रमुख आर्यहतायें हैं !
BDUTT ने शायद ३ शादिये की - पर इसकी गारण्टी नहीं की वे अंतिम समय किसके साथ काटेंगी !!
न ही आमिर का और सैफ का कोई भरोसा है !
हाँ यह भी हो सकता है की ये अपना जीवन पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वृधाश्रम या नौकरों के भरोसे काटें !
जो हमारे पूर्वजो ने कभी नहीं काटा !!
शायद इसलिए की उन्होंने रोमांस नहीं किया या आसक्ति की तीव्रता के प्रभाव में आकर विवाह नहीं किये परिवार विच्छेद नहीं किये या उन्होंने किसी १ व्यक्ति के साथ साथ अपने परिवार को भी महत्त्व दिया !!
जो भी था पर वह समय बेहतर था !!
यह मेरे निजी विचार हैं और संशोधन के लिए सभी के सामने पेश हैं !!
अगर असहमत हों तो कमेंट करें अगर सहमत हों तो कोई बात ही नहीं है !!
Awasthi Sachinभारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम): मैंने एक फौरी अध्यन किया भारतीय पौराणिक इतिहास का !
बड़ा अजीब लगा - समझ में नहीं आया यह है क्या ?
यह परम्परायें जीवित कैसे थी आज तक ?
और आज इनके कमजोर होने के कारण कैसे परिवार टूट रहे हैं ?
भारतीय समाज में प्रेम का अभूतपूर्व स्थान है पर रोमांस का कोई स्थान नहीं रहा ?
हरण और वरण की परंपरा रही पर परिवार छोड़ कर किसी से विवाह की परंपरा नहीं रही !
हरण की हुयी स्त्री उसके परिवार की हार का सूचक थी और वरण की हुयी स्त्री खुद अपना वर चुनती थी पर कुछ शर्तो के साथ पूरे समाज की उपस्तिथि में !
रोमांस की कुछ घटनाएं कृष्ण के पौराणिक काल में सुनने में आती हैं पर उन में से किसी भी घटना में कही भी विवाह का जिक्र नहीं है !
रुक्मणी हरण का जिक्र है ; मीरा के प्रेम का जिक्र है पर रोमांस के बाद विवाह का जिक्र मुझे कहीं देखने में नहीं मिला आपको यदि मिले तो अवश्य बतायें !
प्रेम, वात्सल्य का भरपूर उल्लेख है ; वचन और कर्तव्यपरायणता का भरपूर उल्लेख है !
गांधारी से ले कर सीता तक, कैकई से लेकर मंदोदरी तक के वचन का और राम से लेकर श्रवण कुमार तक, सीता से लेकर लक्ष्मण की पत्नी तक की कर्तव्यपरायणता हमें भरपूर देखने को मिलती है पर आज का रोमांस कहीं नहीं है !
शिव की पत्नी पार्वती का विवाह भी वरण ही माना जायेगा और पति के सम्मान में अग्नि स्नान कर्तव्य !!
शिव का तांडव प्रेम है पर अंग्रेजों का रोमांस तो बिलकुल नहीं !!
अविवाहित कन्या का किसी को देखकर पसंद कर लेना और फिर उसे पाने में जमीन आसमान एक कर देने का उदाहरण शिव और उमा के प्रसंग में मिलता है और भीष्म पितामह का आजीवन कुंवारा रहना भी कथाओं में है !!
पर कहीं भी समाज या परिवार की अनिक्षा से पुरुष के विवाह का प्रकरण नहीं मिलता !!
१ प्रकरण मिलता है सुभद्रा का पर सुभद्रा और उनके भाई ने कृष्ण को सुभद्रा हरण के लिए मनाया था !!
पत्नी भक्ति का भी १ प्रकरण मिलता है कालजयी कवि कालिदास का - पर उसे भी तिरस्कार की नज़रो से देखा गया !! (यही १ प्रकरण रोमांस का है)
भारतीय पौराणिक कथाओं में पत्नी प्रेम के १०० उदाहरण हैं और पति प्रेम के १००० पर पूरा पौराणिक काल आसक्त प्रेम (रोमांस) से शून्य है !!
विशुद्ध प्रेम के उदाहरण की अगर हम बात करें तो राम का सीता से, गांधारी का कौरव राज से ; शिव का उमा से दिखायी देता है पर यह प्रेम आसक्त नहीं है यह प्रेम कर्तव्य निष्ठ है, किसी ने जंगल जाना स्वीकार किया किसी ने आँखों पर पट्टी बंधी !!
किसी ने पिता के आदेश को माना और उसकी पत्नी ने भी इसे स्वीकार किया !
रावण ने अपनी पत्नी को दिया वचन निभाया और सीता को स्पर्श भी नहीं किया !
राम ने सीता हरण के अपराधी का कुल समेत नाश किया !
लक्ष्मण ने अपनी पत्नी की मर्यादा रखी और सूर्पनखा की नाक काट ली !
शिव ने तो पार्वती के प्रेम में श्रृष्ठि के विनाश की व्यवस्था कर ली ; जो सदैव सराहनीय है !!
कालिदास ही हुए हैं जिनके प्रेम को हम प्रेम नहीं रोमांस कह सकते हैं पर इस रोमांस के कारण उन्हें बड़ा अपयश भोगना पड़ा !!
भारतीय पुरुष प्रेम कर सकता है और करता भी है ; पर यह प्रेम कई हिस्सो में बनता होता है ; यह आसक्त हो ही नहीं सकता !
यह पिता का प्रेम भी होता है, यह माँ के लिए भी होता है यह भाई और बहन के लिए भी होता है तभी तो परिवार संगठित होता है ?
सब साथ होते हैं तो ताकत होती है समस्याओं का प्रतिहार बेहतर होता है !
और जीवन भर का साथ होता था !!
अब आसक्त प्रेम है - जो पश्चिम से आ रहा है जिसमे आसक्ति है अपेक्षाएं है पर कर्तव्य नहीं हैं - इसमें अधिकार कोर्ट देता है - व्यवस्थाएं देता है की आधी संपत्ति का मालिकाना हक़ और जीवन भर भरण पोषण पर कर्तव्य का निर्धारण कोर्ट कैसे कर सकता है ?
इसी आसक्त प्रेम में रेखा जैसी सुंदरी की कई शादियां टूटती हैं और इसी आसक्त प्रेम में ऋतिक रोशन का तलाक़ होता है और यही आसक्त प्रेम सिल्क स्मिथा को आत्महत्या को मजबूर करता है !
इस आसक्त प्रेम से इतर समर्पित प्रेम की तलाश में सलमान कुवंरा है और आमिर इसी आसक्त प्रेम के लिए परफेक्शनिस्ट की तरह परफेक्ट लड़की की तलाश में लगे रहे जो मैडम राव के रूप में पूरी हुयी की नहीं ये वही जाने !!
अब उपसंहार यह है जिस भारतीय पुरुष के डीएनए में उनके पूर्वजो ने रोमांस छोड़ा ही नहीं है वह रोमांस कर कैसे सकता है ?
और जो इस आसक्त प्रेम को पाने की कोशिश करेगा उसे अगर कोई ज्यादा आकर्षण युक्त साथी प्राप्त हो तो वह क्या करे ?
संवैधानिक मान्यताएं कहती हैं की हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह की छूट है - और विवाह विच्छेदन की भी ! (यहाँ कोर्ट एक तरह से परिवार विखंडन और अनैतिकता को बाधा रहा है )
पिता की जवाबदारी पुत्र या पुत्री के लिए १८ साल है - पर इस मान्यता को कोई पुत्र/पुत्री या पिता नहीं मानता जबकि वैवाहिक कानूनों में सभी अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी विवेचना करते हैं और सभी इसके लिए लड़ते हैं ?
इसका कारण क्या है यह हमें सोचना पड़ेगा !
संविधान की रचना के पूर्व हर पत्नी पति की जवाबदारी होती थी . अब आधी स्त्रियां अपने भाई, पिता या अगले पति की जिम्मेदारियां होती हैं !
हर पुरुष की जिम्मेदारी उसका परिवार होता है ; पर अब इसमें उसकी एक्स और आने वाली वाई भी जुड़ गयी है अब रिश्ते सौदे हो गए हैं ; ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा अमीर इसकी प्रमुख आर्यहतायें हैं !
बरखा दत्त ने शायद ३ शादिये की - पर इसकी गारण्टी नहीं की वे अंतिम समय किसके साथ काटेंगी !!
न ही आमिर का और सैफ का कोई भरोसा है !
हाँ यह भी हो सकता है की ये अपना जीवन पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वृधाश्रम या नौकरों के भरोसे काटें !
जो हमारे पूर्वजो ने कभी नहीं काटा !!
शायद इसलिए की उन्होंने रोमांस नहीं किया या आसक्ति की तीव्रता के प्रभाव में आकर विवाह नहीं किये परिवार विच्छेद नहीं किये या उन्होंने किसी १ व्यक्ति के साथ साथ अपने परिवार को भी महत्त्व दिया !!
जो भी था पर वह समय बेहतर था !!
यह मेरे निजी विचार हैं और संशोधन के लिए सभी के सामने पेश हैं !!
अगर असहमत हों तो कमेंट करें अगर सहमत हों तो कोई बात ही नहीं है !!
Awasthi Sachin