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कांग्रेस और गाँधीयो के भय

31 मई 2016 की फेसबुक पोस्ट... कांग्रेस पर यह लेख मेरे स्वयं के विचार हैं और हर उस व्यक्ति, संस्था, संगठन एवं कंपनी को मैं इसे शेयर करने व छापने का अधिकार इस बाध्यता के साथ देता हूँ कि  ...

द्विपार्टी व्यवस्था की तरफ कांग्रेस

#हथौड़ा_पोस्ट 2011 - भ्रष्टाचार पर चर्चा शुरू। 2012 - गुजरात दंगों पर चर्चा, मोदी हत्यारा, खून का दलाल। 2013 - करन थापर का इंटरव्यू - मोदी ने मुसलमानों को कुत्ता बोला । 2014 - सब प्रदेशो में कांग्...

छत्तीसगढ़ की राजनीती में हाथी की चाल........

मेरे मित्र लगातार ऑरकुट और निजी चर्चाओं में प्रश्न करते रहें है कि आज के दौर में बा सा पा का भविष्य क्या है ? छत्तीसगढ़ के आने वाले चुनाव में बा सा पा का क्या योगदान रहेगा? कांसी राम जी के बाद मायावती बहन का क्या भविष्य होगा? क्या बा सा पा कांग्रेस को नुकसान पहुँचायेगी ? मैं भी इस विषय पर काफी समय से लिखना चाह रहा हूँ........ आज के परिद्रश्य में बा सा पा के वैचारिक स्तर में काफी सुधार हुआ है. पार्टी जातिगत विद्वेष से ऊपर उठ कर सामाजिक और राष्ट्रीय सौहद्रता कि बात कर रही है. कुछ समय पूर्व तक तिलक तराजू और तलवार. इनको मरो जूते चार. कि विचार धारा वाली मायावती अब ब्राह्मण. बनिया और ठाकुरों को अच्छे पदों पर बैठा रही है, उनका सम्मान कर रही है. बा सा पा पर कभी भी धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप नहीं लगा न ही मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्म परिवर्तन का ही आरोप लगा है. बहुजन समाज पार्टी पर सिर्फ १ आरोप लगता था कि पार्टी जातिगत वैमनस्यता फैलाती है जो अब अपरिहार्य है ...... आज के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो बा सा पा एक मात्र ऐसी पार्टी दिखती है जो पूर्णतः धर्म निर्पेक्ष्य, सामाजिक, धार्मिक...

कांग्रेस : कुतर्कों का महिमा मंडन

कांग्रेस : कुतर्कों का महिमा मंडन  कुछ प्रश्न उमड़ घुमड़ के मन में धमाचौकड़ी मचाये हुए थे. और जिज्ञासा को शांत करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है. बहुत सारे राजनैतिक, पत्रकार और पदाधिकारी मित्रों से मैंने ये कुप्रश्न किये, पेश है उनकी एक बानगी. प्रश्न१- कांग्रेस देश की सबसे बड़ी और पूरे देश में जनाधार रखने वाली पार्टी है,  फिर सरकार बनाने में इतनी दिक्कत क्यों? उत्तर - ये आपस में लड़ना तो बंद करें. प्रश्न१-अ : बीजेपी में भी तो गुटीय संघर्ष है ? उत्तर - कम है इतना नहीं है, संघ और बीजेपी के बड़े नेता इस पर नियंत्रण रखते हैं. प्रश्न१ -ब : कांग्रेस में तो बीजेपी से बड़े और ज्यादा चमक वाले नेता हैं जो ज्यादा सक्षम हैं ? उत्तर - हैं तो !! पर मुद्दे कहाँ हैं, विचार धारा कहाँ है ? प्रश्न१-स- वाह भाई वाह, धर्मनिर्पेक्षता और कांग्रेस का इतिहास ? उत्तर- इतिहास सुनना कौन चाहता है ? आप सुनेंगे क्या निजाम हैदराबाद के वंशजो से या महाराणा प्रताप के वंशजो से, उनके पूर्वजों की कहानी ? वाजिद अली शाह के वंशज से फ़ोन पर बात कराऊँ? मैं बोला : न बाबा न मुझे ...

एक था राजा...

एक था राजा जिसकी संतान नहीं थी.  उसने विचार किया और निर्णय लिया कि राज्य के सबसे कमज़ोर और गरीब आदमी को मैं, "राज पाठ सौंपकर संन्यास ले लूँ" राजा ने मुनादी करवा दी.  सेनापति एक कमज़ोर साधू को पकड़ लाये. राजा : तुम्हारे पास कितनी संम्पत्ति है. साधू : सिर्फ कमंडल है. राजा : और ताकत. साधू : घसीट घसीट के चल लेता हूँ. राजा : मैं तुम्हें इस राज्य का राजा बनाता हूँ. साधू : नहीं महाराज नहीं.... राजा उस साधू का बलपूर्वक राजतिलक कर देता है.  साधू राजा मंत्रियों को बुलाकर राज्य में...  मुफ्त अनाज बत्वाना शुरू कर देता है. कुछ दिन बाद साइकिलें बंटाना शुरू करता है. फिर गायें और बैल बांटता है.... एक दिन कोषाध्यक्ष आ कर राजा से कहता है.... महाराज अब तो राजकोष ख़त्म हो गया है अब ये मुफ्त आवंटन कैसे होगा... बताएं महाराज मैं क्या करूं... राजा : राजसी वस्त्र उतार कर भगवा वस्त्र  धारण कर लेता है और कहता है....    जाओ कोषाध्यक्ष... जाकर मेरा कमंडल लाओ. ;-) (जांजगीर के एक मित्र द्वारा यह कहानी नवीन टाइल्स कोरबा में सुनाई गयी.)

अनिवार्य मतदान है लोकशक्ति का शंखनाद : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

गुजरात विधानसभा ने अनिवार्य मतदान का विधेयक क्या पास किया, सारे देश में हंगामा मच रहा है| सारे देश से इस विधेयक का कोई संबंध नहीं है| यह सिर्फ गुजरात के लिए है| वह भी स्थानीय चुनावों के लिए ! विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तो जैसे अब तक होते हैं, वैसे ही होते रहेंगे| यदि उनमें कोई मतदान न करना चाहे तो न करे| सारे देश में अनिवार्य मतदान लागू करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि लोकसभा संसद उसकी अनुमति न दे| फिर भी सारे देश में प्रकंप क्यों हो रहा है ? शायद इसलिए कि इस क्रांतिकारी पहल का श्रेय नरेंद्र मोदी को न मिल जाए| यह पहल इतनी अच्छी है कि इसके विरोध में कोई तर्क ज़रा भी नहीं टिक सकता| आज नही तो कल, सभी दलों को इस पहल का स्वागत करना होगा, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र् में यह नई जान फूंक सकती है| अब तक दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है लेकिन यही व्यवस्था अगर भारत में लागू हो गई तो उसकी बात ही कुछ और है| यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र् में मतदान करना अनिवार्य हो गया तो अमेरिका और बि्रटेन जैसे पुराने और संशक्त लोकतंत्र को भी भारत का अनुसरण करना पड़ सकता है, हालांकि भार...

पिता का वचन : कहानी

प्रिय श्री संजीव जी की लिखी इस यथार्थ परक और संवेदनशील कहानी को मैं साभार अपने ब्लॉग मे डाल रहा हूँ. संजीव जी कोटि कोटि धन्यवाद गरीब आदिवासी की वेदना से अवगत करने के लिए.... आपका ही आलोचक पिता का वचन कहानी : संजीव तिवारी चूडियों की खनक से सुखरू की नींद खुल गई । उसने गहन अंधकार में रेचका खाट में पडे पडे ही कथरी से मुह बाहर निकाला, दूर दूर तक अंधेरा पसरा हुआ था । खदर छांधी के उसके घर में सिर्फ एक कमरा था जिसमें उसके बेटा-बहू सोये थे । बायें कोने में अरहर के पतले लकडियों और गोबर-मिट्टी से बने छोटे से कमरानुमा रसोई में ठंड से बचने के लिए कुत्ता घुस आया था और चूल्हे के राख के अंदर घुस कर सर्द रात से बचने का प्रयत्न कर रहा था । जंगल से होकर आती ठंडी पुरवाई के झोंकों में कुत्ते की सिसकी फूट पडती थी कूं कूं । सुखरू कमरे के दरवाजे को बरसाती पानी की मार को रोकने के लिए बनाये गये छोटे से फूस के छप्पकर के नीचे गुदडी में लिपटे अपनी बूढी आंखों से सामने फैले उंघते अनमने...

प्रतिव्यक्ति आय और सरकार.......

प्रतिव्यक्ति आय और सरकार....... भारतीय अर्थव्यवस्था का आंकलन हमेशा से अर्थ शास्त्री करते रहे हैं और उसे सरकारें अपने नफे और नुकसान से जोड़ती आई हैं, राष्ट्रीय आय, प्रतिव्यक्ति आय जैसे कुछ शब्दों का उपयोग सरकार हमेशा से भ्रम फैलाने के लिए करती हैं.... राष्ट्रीय आय वह आय होती है जिसमें सारे देश के द्वारा अर्जित आय का योग होता है . और प्रतिव्यक्ति आय राष्ट्रीय आय मे जनसंख्या का भाग देने से प्राप्त होती है. सरकारें राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय को जानता की तरक्की से जोड़ कर देखती हैं. आज देश की ७५% भूमि २५% लोगों के पास है और ७५% लोग २५% जमीन के मालिक हैं. यही हालत उद्योग जगत की है यहाँ १५० परिवारों के पास देश की आधी से ज्यादा उत्पादन इकाइयां हैं और बाकि पूरे हिन्दुस्तान के व्यव्सायीयों के पास आधी से भी कम. आज़ादी के बाद ३ दशकों तक विकास दर ३.५% थी, ८० मे ३%, ९० मैं यह ५.४% रही, २००० से २००७ सन तक ६.९% प्रति वर्ष रही. प्रति व्यक्ति आय ५% प्रतिवर्ष बड़ी. लेकिन विकास दर बदने से न तों बेरोजगारी कम हुई न गरीबी. सरकारी आंकडे बताते हैं की उत्पादन बड़ा है लेकिन रोज़गार कम हुए हैं. इसका कारण पूँज...