सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कांग्रेस : कुतर्कों का महिमा मंडन


कांग्रेस : कुतर्कों का महिमा मंडन 

कुछ प्रश्न उमड़ घुमड़ के मन में धमाचौकड़ी मचाये हुए थे.

और जिज्ञासा को शांत करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है.

बहुत सारे राजनैतिक, पत्रकार और पदाधिकारी मित्रों से मैंने ये कुप्रश्न किये, पेश है उनकी एक बानगी.

प्रश्न१- कांग्रेस देश की सबसे बड़ी और पूरे देश में जनाधार रखने वाली पार्टी है, 
फिर सरकार बनाने में इतनी दिक्कत क्यों?
उत्तर - ये आपस में लड़ना तो बंद करें.
प्रश्न१-अ : बीजेपी में भी तो गुटीय संघर्ष है ?
उत्तर - कम है इतना नहीं है, संघ और बीजेपी के बड़े नेता इस पर नियंत्रण रखते हैं.
प्रश्न१ -ब : कांग्रेस में तो बीजेपी से बड़े और ज्यादा चमक वाले नेता हैं जो ज्यादा सक्षम हैं ?
उत्तर - हैं तो !! पर मुद्दे कहाँ हैं, विचार धारा कहाँ है ?
प्रश्न१-स- वाह भाई वाह, धर्मनिर्पेक्षता और कांग्रेस का इतिहास ?
उत्तर- इतिहास सुनना कौन चाहता है ?
आप सुनेंगे क्या निजाम हैदराबाद के वंशजो से या महाराणा प्रताप के वंशजो से, उनके पूर्वजों की कहानी ?
वाजिद अली शाह के वंशज से फ़ोन पर बात कराऊँ?
मैं बोला : न बाबा न मुझे बक्शो....
कांग्रेस की धर्म निर्पेक्षता उत्तर प्रदेश चुनाव में मुस्लिमों के साथ होती है और और पूर्वोत्तर के किसी राज्य में ईसाईयों के साथ, 
जहाँ हिन्दू धर्म की जरूरत पड़ी वहां उनके साथ.
कुल मिलाकर जहाँ वोट वहां लोट !!
ये कांग्रेस की मजबूरी है और जनता इसे बहुरूपियापन मानती है.
अब लोगों (खासकर उ.प्र के मुस्लिम) को, जहाँ तीसरा विकल्प दिखता है, वहां वोट करते हैं.
धर्मनिरपेक्ष तो सिर्फ वामपंथी हैं.
मैं चुप :
प्रश्न-२-अ- वामपंथी से याद आया वहां तो ममता की सरकार है?
उत्तर: ममता कांग्रेस में थी, प्रणव दा ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया, जनता को तीसरा विकल्प दिखा 
एक दबंग और कर्मठ महिला के रूप में.
टाटा के विरोध ने उन्हें अच्छा कवरेज और समर्थन मिला, और वो सी.एम हैं.
प्रणव दा और सोनिया दाई को आंखे दिखा रही हैं.
मैं चुप :
जनाधार विहीन नेता को नेता बनाया जा सकता है, पर उस समय जब आप सक्षम हों, और आपके पास पर्याप्त समय हो.
प्रणव को फटकार लगाई होती पार्टी ने तो १० साल पहले कांग्रेस की सरकार बन जाती.
प्रति प्रश्न: आप बताओ महाराज, आँध्र में आगे क्या होगा ?
प्रणव दा जैसे कई हैं पार्टी में, और जहाँ नहीं हैं वहां पैदा किये जा रहे हैं.
शीर्ष नेतृत्व विरोध ख़त्म नहीं कर सकता क्या ? 
यू.पी में क्या हुआ ?
प्रति उत्तर: मैं इतना बड़ा राजनैतिक पंडित नहीं हूँ माननीय... 
पर यू.पी में जो हुआ उसका मुझे दुःख है. सोनिया जी और राहुल जी के लोकसभा में हार बुरी लगी. 
प्रश्न२-ब- पर अटल बिहारी और मुरली मनोहर जोशी के क्षेत्रो में भी तो बीजेपी हारी ?
उत्तर- वही तो महाराज में कहना चाहता हूँ, व्यवस्था परिवर्तन चाहती है जनता, 
ये दोनों पार्टियों से जनता ऊब गयी है.
विकल्प तलाशती है ये, मजबूत विकल्प...
प्रश्न२-स- कुछ लोग कहते हैं की अन्ना का प्रभाव था...
उत्तर- प्रभाव नहीं कह सकते पर कुछ असर तो था,
इस यू.पी चुनाव ने संकेत दे दिया है की जनता जागरूक हो गयी है.
प्रश्न२-द- कैसे ?
उत्तर : मुख्तार अंसारी, डी.पी यादव, आपके गोरखपुर वाले सभी हारे.
और राजा भैया कैसे जीते ?     
प्रति उत्तर: भाई वो माया से प्रताड़ित थे तो सहानुभूति मिली.
प्रति प्रश्न : और अखिलेश कितनी बार पिटे और जेल गए.
प्रति उत्तर: १६ बार .
प्रति प्रश्न: सोनिया जी ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा तो अगले चुनाव में उन्हें क्या मिला?
प्रति उत्तर: उन्हें कुछ नहीं ,पार्टी को सत्ता मिली.
ये भारत वर्ष है महाराज, यहाँ सहानुभूति की बड़ी कीमत है.
संघर्ष की भी कीमत है, पर संघर्ष अमूल्य जब होता है जब उसमें सहानुभूति मिल जाती है...
जैसे सोने पे सुहागा !! हा हा हा...
वार्तालाप शेष : क्रमशः 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वैश्विक व्यवस्था को पर्यावरण संरक्षण हेतु सांस्कृतिक विकल्प

सवाल पूछने का समय: अगर हम अपने समय और समाज को ज़रा ठहरकर देखें, तो यह समझने में देर नहीं लगेगी कि कोई अजीब-सी दौड़ लगी है। भाग-दौड़, होड़, लाभ-हानि, सत्ता, बाजार~  यह शब्द, आज सब कुछ साधने वाले शब्द बन चुके हैं, सारे मुद्दे और बहसें गोया इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं।  जब आप सवाल करते हैं कि "क्या यह वैश्विक व्यवस्था मानव समाजों, उनकी आस्थाओं, मूल्यों और सांस्कृतिक आदर्शों को नजरअंदाज करती है?", तो उसका सीधा सा उत्तर निकलेगा~ हाँ, और यह सब बड़ी सुघड़ता के साथ, बड़ी सधी नीति के साथ, लगभग अदृश्य तरीके से होता आ रहा है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि कौन सी व्यवस्था पिछली सदी में कैसी थी, क्योंकि अब तो यह नई शक्लें ले चुकी है~ तकनीक की शक्ल में, विकास की शक्ल में, नव-मानवतावाद की शक्ल में, और कभी-कभी खुद "मानवता" के नाम का झंडा लेकर भी!  सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं और भाषणों के बीच कहीं हमारा पर्यावरण, हमारी सांस्कृति प्राकृति और हमारी अपनी परंपराएं बची रह गई हैं? "ग्लोबल ऑर्डर" और उसकी ताकत वैश्विक शासन व्यवस्था या जिसे fancy शब्दों में "ग्लोबल ऑर्डर" क...

ब्रह्म मुहूर्त: सनातनी ज्ञान जो दुनिया बदल सकता है; स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर एक गहन नजर

 सनातनी शास्त्र ; अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर एक गहन नजर क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक साधारण आदत; सुबह सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले जागना और रात को जल्दी सो जाना; पूरी दुनिया को बचा सकती है?  हिंदू सनातनी शास्त्रों और आयुर्वेद की यह प्राचीन परंपरा न सिर्फ व्यक्तिगत स्वास्थ्य को मजबूत करती है, बल्कि अगर इसे वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए, तो बिजली की भारी बचत, बीमारियों पर खर्च में कमी और कार्बन क्रेडिट से कमाई जैसे लाभ मिल सकते हैं।  इस लेख में हम आंकड़ों के आधार पर इसका विश्लेषण करेंगे, ताकि समझ आए कि यह बदलाव व्यावसायिक दुनिया और समाज के लिए कितना क्रांतिकारी हो सकता है। खंड I: स्वास्थ्य की नींव; ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य हमारा यह विश्व (स्थावर जंघम प्राणी) एक प्राकृतिक घड़ी पर चलते है; जिसे "सर्कैडियन रिदम" कहते हैं।  आयुर्वेद, शास्त्र और आधुनिक विज्ञान तीनों इस बात पर सहमत हैं कि इस घड़ी से तालमेल बिठाने से स्वास्थ्य में अभूतपूर्व सुधार होता है। ब्रह्म मुहूर्त; सूर्योदय से करीब 90 मिनट पहले का समय; इसका आदर्श उदाहरण है। आयुर्वेद में इसे जागने और ध्यान के ल...

सुनहरा पिंजरा या नई गुलामी?

  'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है।  मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...