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सुनहरा पिंजरा या नई गुलामी?

  'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य

कल शाम की बात है। 

मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।"

उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था।

आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने से कतरा रहे हैं। हम अक्सर सुनते हैं कि तकनीक हमारी ज़िंदगी आसान बना देगी, लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हर सहूलियत की एक कीमत होती है?

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसे विद्वान लोग 'महान संक्रमण' या 'Great Transition' का नाम दे रहे हैं। सुनने में बड़ा भारी शब्द लगता है, लेकिन असलियत बहुत कड़वी है। हमें बचपन से सिखाया गया कि मशीनें इंसान की गुलाम होती हैं, वे हमारी मदद के लिए बनाई गई हैं। लेकिन आज अपने आस-पास नज़र दौड़ाइए। क्या सच में मशीनें हमारी मदद कर रही हैं, या वे धीरे-धीरे हमें हमारी ही जगहों से बेदखल कर रही हैं?

हकीकत यह है कि उत्पादन यानी चीज़ें बनाने का काम अब इंसानों के हाथों से फिसलता जा रहा है। पहले खेत में किसान पसीना बहाता था, फैक्ट्री में मजदूर हथौड़ा चलाता था। अब वो जगह डेटा, एल्गोरिदम और ऑटोमेटिक मशीनों ने ले ली है। और इसका नतीजा? जो धन, जो पैसा पहले मेहनत करने वालों में बंटता था, वह अब सिमट कर दुनिया के चंद उंगलियों पर गिने जाने वाले लोगों की तिजोरियों में कैद हो रहा है।

मुझे यह देखकर पुराने ज़माने की याद आती है। इतिहास की किताबों में हमने 'सामंतवाद' या ज़मींदारी प्रथा के बारे में पढ़ा था। तब ज़मीन ही सब कुछ थी। ज़मींदार ज़मीन का मालिक होता था और बाकी पूरा गाँव उस ज़मीन पर सिर्फ मज़दूरी करता था, उसका अपना कुछ नहीं होता था। आज ज़माना बदल गया है, पहनावा बदल गया है, लेकिन फितरत वही पुरानी है। आज 'ज़मीन' की जगह 'डेटा, रोबोट और सर्वर' ने ले ली है। और पुराने ज़मींदारों की जगह ले ली है अमेरिका में बैठे सिलिकॉन वैली के बड़े-बड़े 'कॉरपोरेट टेक दिग्गजों' ने। हम आज़ाद नागरिक नहीं, बल्कि अनजाने में 'डिजिटल गुलाम' बनते जा रहे हैं। एक ऐसी दुनिया बन रही है जिसे आप 'तकनीकी-सामंतवाद' कह सकते हैं।

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जिस गणित पर हमारी दुनिया अब तक चल रही थी, वह गणित अब फेल हो रहा है। पूंजीवाद का एक सीधा-सादा नियम हेनरी फोर्ड ने बहुत पहले बता दिया था। नियम यह था कि एक मज़दूर फैक्ट्री में काम करेगा, उसे बदले में तनख्वाह मिलेगी, और उसी पैसे से वह बाज़ार से कार, जूते, कपड़े या राशन खरीदेगा। यानी मज़दूर ही ग्राहक था। इसी चक्र से बाज़ार चलता था और दुनिया की अर्थव्यवस्था का पहिया घूमता था।

लेकिन अब ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए। जब मज़दूर की कुर्सी पर कोई रोबोट बैठ जाएगा, तो उस रोबोट को तनख्वाह कौन देगा? मशीनों को न तो भूख लगती है, न उन्हें अपने बच्चों की फीस भरनी है, और न ही उन्हें फिल्म देखनी है न पब जाना है न अपने सपने पूरे करने हैं। तो जब लोगों की जेब में पैसा ही नहीं होगा, नौकरियां ही नहीं होंगी, तो बाज़ार में बना हुआ सामान खरीदेगा कौन? रोबोट तो जाकर कार या साबुन नहीं खरीदेगा। यही वह आत्मघाती चक्र है जिस पर दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री चुप्पी साधे बैठे हैं। वे देख रहे हैं कि हम दीवार से टकराने वाले हैं, लेकिन कोई ब्रेक नहीं लगा रहा।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेता रैलियों में चिल्ला-चिल्ला कर वादा करते हैं कि वे फैक्ट्रियां वापस लाएंगे, अमेरिका को फिर से महान बनाएंगे। हो सकता है वे ले भी आएं। लेकिन उन नई फैक्ट्रियों के अंदर झांकेंगे तो आपको वहां इंसान नहीं मिलेंगे। वहां दिन-रात, बिना थके, बिना छुट्टी मांगे मशीनें काम कर रही होंगी। नतीजा क्या होगा? देश के जीडीपी के आंकड़े तो आसमान छुएंगे, देश कागज़ों पर 'अमीर' दिखेगा, लेकिन उसके अंदर रहने वाली जनता, आप और हम, गरीब और बेरोजगार होते जाएंगे।

वहीं दूसरी तरफ, एलन मस्क और जेफ बेजोस जैसे अरबपति, जो खुद को भविष्य का मसीहा मानते हैं, उनके पास एक अलग ही योजना है। वे कहते हैं, "घबराओ मत, जब नौकरियां नहीं रहेंगी तो हम हर महीने लोगों को कुछ पैसे (Universal Basic Income) दे देंगे ताकि वे ज़िंदा रह सकें।" सुनने में कितना अच्छा लगता है न? बिना काम किए पैसा! लेकिन वे एक बुनियादी बात भूल रहे हैं। इंसान सिर्फ पेट भरने के लिए ज़िंदा नहीं रहता। जानवर और इंसान में यही फर्क है। इंसान को सुबह उठने के लिए एक मकसद चाहिए, अपनी मेहनत का सम्मान चाहिए। खैरात पर पलने वाला समाज कभी सिर उठा कर नहीं चल सकता। बिना ग्राहकों के बाज़ार और बिना सम्मान के समाज, ताश के पत्तों के महल की तरह बिखर जाते हैं। यह तबाही की रेसिपी है, किसी सुनहरे भविष्य की नहीं।

तो फिर सवाल यह है कि हम क्या करें? क्या हम बस हाथ पर हाथ धरे अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहें? क्या हम यह मान लें कि हमारा "अनावश्यक" होना तय है?

बिल्कुल नहीं। अभी भी वक्त है, और रास्ता हमारे सामने ही है। लेकिन इस रास्ते पर चलने के लिए हमें अपनी कुछ पुरानी आदतों और गलतफहमियों को छोड़ना होगा। सबसे पहले तो यह सोचना बंद कर दीजिए कि कोई बड़ी कंपनी (चाहे वो Google हो, Amazon हो या कोई और) आकर आपको बचाएगी। अपना डेटा, अपनी मेहनत की कमाई और अपना भविष्य इनके भरोसे छोड़ना सबसे बड़ी बेवकूफी होगी।

सरकार भी Universal Basic Income टैक्स से ही देगी और व्यापारी टैक्स के ऊपर लाभ लेता है, अर्थात जो UBI मिलेगा उसपर भी ये व्यापारी लाभ लेंगे।

हमें उस 'नौकरी' के भ्रम से भी बाहर निकलना होगा जिसके पीछे हम और हमारे माता-पिता सारी ज़िंदगी भागते रहे। वो पुरानी 'सुरक्षित नौकरी' वाली दुनिया अब खत्म हो रही है। और हां, इस दौर में, जब आमदनी का कोई भरोसा नहीं, बड़ा कर्ज लेना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बैंक का कर्ज एक ऐसा फंदा है जो आपको सिस्टम का गुलाम बनाए रखता है।

बहुत संभव है दुनिया भर में बैंक डिफॉल्ट रॉकेट की गति से बढ़े, लंबे समय के लिए गए लोन मुझे संकट में दिखते हैं।

अंधेरा घना ज़रूर है, लेकिन रास्ता मौजूद है। और यह रास्ता बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि हमारे और आपके छोटे-छोटे घरों और मोहल्लों से निकलता है। मुझे लगता है हमें तीन चीज़ों को अपने जीवन में उतारना होगा।

पहली बात, हमें थोड़ा 'लोकल' होना पड़ेगा। इसे आप सीमित वैश्वीकरण (De-globalization) कह सकते हैं। हमें अपनी बुनियादी ज़रूरतों जैसे खाना, दूध, बिजली के लिए दुनिया के दूसरे कोने पर निर्भर रहना बंद करना होगा। सोचिए, अगर कल को कोई बड़ा युद्ध हो जाए या इंटरनेट ठप हो जाए, तो क्या आपके पास खाने का इंतज़ाम है? 

जरूरत है, अपने आस-पास के किसान से, अपने मोहल्ले के दुकानदार से जुड़ें।

दूसरी बात, बड़ी कंपनियों का मोह छोड़ना होगा। हर छोटी चीज़ के लिए ब्रांड्स के पीछे भागना बंद कीजिए। जब आप किसी बड़ी कंपनी का सामान खरीदते हैं, तो पैसा विदेश जाता है या किसी अरबपति की जेब में। लेकिन जब आप अपने पड़ोसी से खरीदते हैं, तो पैसा आपके समुदाय में ही घूमता है इसलिए अगली पीढ़ी को गुलाम होने से बचाना है तो विदेशी ब्रांड का गर्व छोड़े।

तीसरी और सबसे अहम बात, ताकत और पैसे को एक जगह इकट्ठा मत होने दीजिए, इसे हिस्सों में बांट दीजिए। इसे विकेंद्रीकरण (Decentralization) कहते हैं। चाहे इंटरनेट हो, ऊर्जा हो या पैसा। कंट्रोल किसी एक सर्वर पर नहीं, बल्कि हमारे और आपके समुदाय के हाथ में होना चाहिए। अपनी बिजली खुद बनाने की सोचें, अपना डेटा अपने पास रखें, रोबोट पर नियंत्रण समाज का हो।

इन सब में जो चीज़ हमारी मददगार और सबसे बड़ा हथियार बन सकती है, वह है सहकारिता (Co-operatives)।

हम भारतीयों को इसे समझने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, न ही किसी पश्चिमी देश की नकल करने की। हमारे पास 'अमूल', लिज्जत पापड़ और इंडियन काफी हाउस का उदाहरण है। ज़रा सोचिए, अमूल का मालिक कौन है? कोई सूट-बूट वाला 'सीईओ' नहीं जो न्यूयॉर्क या मुंबई के एसी कमरे में बैठा हो। उसके मालिक लाखों छोटे किसान और वो महिलाएं हैं जो रोज़ सुबह उठकर गाय का दूध दुहती हैं। जब अमूल का दूध बिकता है, तो उसका मुनाफा किसी शेयरहोल्डर को नहीं, बल्कि उस महिला को मिलता है, जिससे समाज चलता है, किसी उद्योगपति का प्राइवेट जेट नहीं।

आज हमारी (सरकार और उद्योगपति) की जरूरत 8 अरब लोगो का पेट पालना और सम्मानजनक जीवन देना है; अन्यथा जनता इन्हें उखाड़ कर फेंक देगी।

सहकार ही वह मॉडल है जो हमें तकनीकी युग में बचा सकता है। रोबोट्स को आने दीजिए, तकनीक को बढ़ने दीजिए। लेकिन शर्त यह होनी चाहिए कि उन रोबोट्स और उस AI का मालिकाना हक किसी एक कंपनी के पास नहीं, बल्कि आम लोगों की सहकारी संस्थाओं के पास हो। मशीनें हमारे लिए कमाएं, न कि हमारी नौकरी खाकर हमें सड़क पर ला दें। अगर मशीन मुनाफा कमा रही है, तो वह मुनाफा समाज में बंटना चाहिए, न कि सिर्फ एक व्यक्ति की जेब में जाना चाहिए।

अंत में, मैं बस इतना ही कहूँगा कि अगर हम अब भी नहीं जागे, अगर हमने अब भी अपनी आदतों और सोच को नहीं बदला, तो आने वाला भविष्य एक 'सुलगते पिंजरे' जैसा होगा। बाहर से सब चमकदार दिखेगा, स्क्रीन पर सब रंगीन होगा, लेकिन उस पिंजरे की चाबी हमारे पास नहीं होगी। हम सिर्फ एक 'डेटा पॉइंट' बनकर रह जाएंगे।

8 अरब लोगो को 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' जैसी खैरात नहीं चाहिए, उन्हें अपनी मेहनत का हक चाहिए। हमें दान पर पलने वाली ज़िंदगी नहीं, बल्कि "सम्मान" वाली ज़िंदगी चाहिए।

याद रखिए, यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं है। यह इंसानियत और इंसान को बचाने की लड़ाई है। जब समाज किसी इंसान को कहेगा कि "तुम्हारी अब ज़रूरत नहीं है, तुम फालतू हो," तो सोचिए उस इंसान के आत्मसम्मान का क्या होगा? जब काम और योगदान की जगह मशीनें ले लेंगी, तो इंसान का वजूद ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।

इसलिए, अपने भविष्य की लगाम दूसरों को सौंपना बंद कीजिए। 

साथ आइए, छोटे समूह बनाइए, बातें कीजिए और एक-दूसरे का सहारा बनिए। अपने समुदाय को मज़बूत कीजिए। यही एक रास्ता है जिससे हम और आप, मशीनों की इस भीड़ में भी, अपनी इंसानियत और अपना वजूद ज़िंदा रख पाएंगे।

फैसला आपके हाथ में है गुलामी या सहकारिता?

लेखक: 

सचिन अवस्थी 

अध्यक्ष 

www.thevvf.org

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
पूरीतरह सहमत बिल्कुल सही बात सहकारिता के माध्यम से ही हम समाज व देश को इस संकट से बचा सकते हैं । 🙏

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