सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वर्ण व्यवस्था, आर्य समाज और भारत

वर्ण व्यवस्था : #अद्भुत सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था है।
यह पर्यावरण के लिए भी उपयुक्त है और मानव के लिए भी।
वर्ण व्यवस्था छिन्न भिन्न करके ही #औद्योगिकरण आया, अगर वर्ण व्यवस्था न छिन्न भिन्न हुई होती तो क्या  कोई अपना व्यापार और रोजगार छोड़ फैक्ट्रियों में #मजदूर बनता?
आज 25 साल की उम्र तक पढ़ने के बाद कोई आर्किटेक्ट या इंजीनियर बनता है।
वर्ण व्यवस्था में यह पढ़ाई 12 साल की उम्र में घर पर ही पिता की सोहबत में पूर्ण हो जाती थी।
#डीएनए में #जातिगत ज्ञान होता था तो,  लोग जल्द सीखते थे, हर जाति को उसके जातिगत ज्ञान का सही उपयोग करने की कला उसके पिता के डीएनए से मिलती थी।
बिल्कुल वैसे ही जैसा #अल्सेशियन को सूंघने की शक्ति, ग्रे हाऊंड को उसकी स्पीड, पिट बुल और रॉटविलर को उसकी रक्षण की समझ।
अंग्रेजो के #औद्योगिकरण को जरूरत थी, मजदूरों की और भारत में मजदूर बिना वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न किए मिलना संभव न था।
तो अंग्रेजो ने कुछ व्यवस्थाएं दी, AO ह्युम हो या दयानंद जी या सुवर खाने और शराब पीने वाले जिन्ना।
इन्हे अंग्रेजो ने पैदा ही इसलिए किया क्योंकि वे वर्ण व्यवस्था और #सनातन को छिन्न भिन्न करना चाहते थे।
भारतीय संस्कृति में अंग्रेजी का क्या काम और वैदिक शिक्षा में अंग्रेजी का क्या काम और वैदिक स्कूल में मेज कुर्सी का क्या काम?
दयानंद जी ने स्कूल और कॉलेज खोले उनका नाम दिया Dayanand Anglo-Vedic school और college...
Anglo Indian से थोड़े ऊपर की चीज थी एंग्लो वैदिक...
यह संस्था मशीन थी #वर्ण_व्यवस्था को तोड़ने की, वर्ण व्यवस्था टूटे तो #औद्योगिकरण के लिए बाबू और मजदूर मिलें।।
खोजिए पुराने #DAV आपको सारे DAV अंग्रेजो के धन से अंग्रेजो की कॉलोनियों में, अंग्रेज टीचरों के साथ मिलेंगे।
अंग्रेजो के समय इन स्कूलों के बच्चो पर शोध कीजिए ।
आपको सिर्फ धन्ना सेठों और अंग्रेजो के पिट्ठूओ के बच्चे इन स्कूलों के छात्र मिलेंगे।
अंग्रेजो ने दो तरह के शिक्षण संस्थानों  में पैसा लगाया।
1- DAV
2- MISSION 
मिशन स्कूल का अपना एक कार्यक्षेत्र था।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए तो #मदनमोहन_मालवीय जी ने क्या क्या नहीं किया?
एंग्लो वैदिक स्कूल के लिए धन मालवीय जी के समान उद्यम से नहीं आया यह आया #महारानी के खातों से  औद्योगिकरण के हित में और सनातन के विरोध में।
आज यही #औद्योगीकरण #पर्यावरण का काल बना बैठा है, वर्ण व्यवस्था टूटने से देश #बेरोजगारी से कराह रहा है।
आज माना जाता है की भारत में सबसे पिछड़े #दलित हैं, जिनका मूल पेशा #सेवा था।
उठाइए Nirmala Sitharaman जी के विभाग की रिपोर्ट और जानिए की कितने लाख करोड़ का है यह सेक्टर।
उठाइए Narendra Singh Tomar के विभाग की रिपोर्ट - कृषि और क्रय विक्रय जो सिर्फ वाणिको के हांथ में थी, उसका क्या योगदान है #जीडीपी में,
उठाइए - कंस्ट्रक्शन का धंधा और देखिए आज #प्रजापति और #राजमिस्त्री जैसी जातियों का भारतीय अर्थ व्यवस्था में कितना हिस्सा है।
उठाइए Amit Shah जी और Rajnath Singh जी के विभाग की रिपोर्ट - और जानिए #क्षत्रिय वर्ण का आज #अर्थव्यवस्था में कितना हिस्सा होना चाहिए?
#ब्राह्मणों की अर्थव्यवस्था में हिस्सा भी देखिए...😂
#भिक्षा और #दान पर पलने वाला यह #समाज आज क्या कर रहा होता?
सच मानिए...
#ब्राह्मणों का #अंग्रेज बुरा न कर पाए, भिक्षा से पलने वाला यह वर्ग आज भिक्षा बांटने की स्तिथि में है।
मायावती हों या कोई और सबकी टीम में सबसे प्रभावशाली ब्राह्मण ही हैं।
पर बुरा तो हुआ है, किसका बुरा हुआ?
#देश का धर्म का और उसका जिसने अपना वर्ण छोड़ा।
#जैन आज पूरे देश में 50 लाख भी नहीं हैं, जिन्होंने वर्ण नहीं त्यागा वह ही आज सबसे धनी कौम है।
मारवाड़ी, अग्रवाल जैसे लोग जिन्होंने वर्ण व्यवस्था अनुरूप धर्म का पालन किया वे आज आरक्षण और बेरोजगारी का रोना नहीं रोते...
#विचारे और पहचाने की #हमारा सनातन #ज्ञान #विज्ञान #समाजशास्त्र , दर्शन और मानवीयता में कितना व्यहवारिक है। 🙏
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वैश्विक व्यवस्था को पर्यावरण संरक्षण हेतु सांस्कृतिक विकल्प

सवाल पूछने का समय: अगर हम अपने समय और समाज को ज़रा ठहरकर देखें, तो यह समझने में देर नहीं लगेगी कि कोई अजीब-सी दौड़ लगी है। भाग-दौड़, होड़, लाभ-हानि, सत्ता, बाजार~  यह शब्द, आज सब कुछ साधने वाले शब्द बन चुके हैं, सारे मुद्दे और बहसें गोया इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं।  जब आप सवाल करते हैं कि "क्या यह वैश्विक व्यवस्था मानव समाजों, उनकी आस्थाओं, मूल्यों और सांस्कृतिक आदर्शों को नजरअंदाज करती है?", तो उसका सीधा सा उत्तर निकलेगा~ हाँ, और यह सब बड़ी सुघड़ता के साथ, बड़ी सधी नीति के साथ, लगभग अदृश्य तरीके से होता आ रहा है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि कौन सी व्यवस्था पिछली सदी में कैसी थी, क्योंकि अब तो यह नई शक्लें ले चुकी है~ तकनीक की शक्ल में, विकास की शक्ल में, नव-मानवतावाद की शक्ल में, और कभी-कभी खुद "मानवता" के नाम का झंडा लेकर भी!  सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं और भाषणों के बीच कहीं हमारा पर्यावरण, हमारी सांस्कृति प्राकृति और हमारी अपनी परंपराएं बची रह गई हैं? "ग्लोबल ऑर्डर" और उसकी ताकत वैश्विक शासन व्यवस्था या जिसे fancy शब्दों में "ग्लोबल ऑर्डर" क...

ब्रह्म मुहूर्त: सनातनी ज्ञान जो दुनिया बदल सकता है; स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर एक गहन नजर

 सनातनी शास्त्र ; अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर एक गहन नजर क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक साधारण आदत; सुबह सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले जागना और रात को जल्दी सो जाना; पूरी दुनिया को बचा सकती है?  हिंदू सनातनी शास्त्रों और आयुर्वेद की यह प्राचीन परंपरा न सिर्फ व्यक्तिगत स्वास्थ्य को मजबूत करती है, बल्कि अगर इसे वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए, तो बिजली की भारी बचत, बीमारियों पर खर्च में कमी और कार्बन क्रेडिट से कमाई जैसे लाभ मिल सकते हैं।  इस लेख में हम आंकड़ों के आधार पर इसका विश्लेषण करेंगे, ताकि समझ आए कि यह बदलाव व्यावसायिक दुनिया और समाज के लिए कितना क्रांतिकारी हो सकता है। खंड I: स्वास्थ्य की नींव; ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य हमारा यह विश्व (स्थावर जंघम प्राणी) एक प्राकृतिक घड़ी पर चलते है; जिसे "सर्कैडियन रिदम" कहते हैं।  आयुर्वेद, शास्त्र और आधुनिक विज्ञान तीनों इस बात पर सहमत हैं कि इस घड़ी से तालमेल बिठाने से स्वास्थ्य में अभूतपूर्व सुधार होता है। ब्रह्म मुहूर्त; सूर्योदय से करीब 90 मिनट पहले का समय; इसका आदर्श उदाहरण है। आयुर्वेद में इसे जागने और ध्यान के ल...

सुनहरा पिंजरा या नई गुलामी?

  'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है।  मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...