रविवार, 21 जून 2009

कुछ शेर कुछ गज़ले...


कुछ शेर और गज़ले जो मुझे पसंद हैं...
शायद आप को भी पसंद आयें...

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,
मिल जाये तों मिटटी है खो जाये तों सोना है,
अच्छासा कोई मौसम तनहा सा कोई आलम,
हर वक़्त का रोना तों बेकार का रोना है,
बरसात का बादल तों दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है,
गम हो के ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं,
फिर रस्ता ही रस्ता है न हँसना है न रोना है,
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,

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जबसे हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए II
हुस्न पर निखार आ गया, आईने स्याह हो गए II
आँधियों की कुछ खता नहीं, हम ही दर्द -ऐ- राह हो गए II
दुश्मनों को चिट्ठियाँ लिखो, दोस्त खैर ख्वाह हो गए II
जबसे हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए II

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हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ,
इधर से गुज़ारा था सोचा सलाम करता चलूँ,
निगाहों दिल की यही आख़िरी तमन्ना है,
तुम्हारी जुल्फ के साये मे शाम करता चलूँ,
उन्हें ये जिद कि मुझे देख कर किसी को न देख,
मेरा ये शौक कि सबसे कलाम करता चलूँ,
ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन,
अब आ गया हूँ दो दिन कयाम करता चलूँ
हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ,
इधर से गुज़ारा था सोचा सलाम करता चलूँ,

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तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं, ऐसी तनहाई का ज़वाब नहीं,
गाहे ब गाहे इसे पढ़ा कीजे, दिल से बहतर कोई किताब नहीं,
जाने किस किस की मौत आई है, आज रुख पे कोई नकाब नहीं.
वो करम उंगलिओं पे गिनते हैं, जुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं,
ऐसी तन्हाई का ज़वाब नहीं....तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं,

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दिल ही तों है न संग ओ खिश्त, दर्द से भर न जाये क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों,
दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आसमान नहीं
बैठे है रह गुज़र पे हम, गैर हमें उठाये क्यूं
हाँ वो नहीं खुदा परस्त, जाओ वो बे वफ़ा सही,
जिसको हो दीनो दिल अज़ीज़, उसकी गली मे जाये क्यों.
ग़ालिब इ खस्ता के बगैर कौनसे काम बंद हैं
रोइए जार जार क्या कीजिये हाय हाय क्यों,
दिल ही तों है न संग इ खिश्त, दर्द से भर न जाये क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों,

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