मंगलवार, 3 जुलाई 2012

गुरु


जी हाँ हम सभी के जीवन में हर जगह, किसी न किसी रूप में पूजनीय और प्रेरणादायी ब्यक्तित्व "गुरु" के रूप में उपलब्ध होते ही है जो जीवन में हमेशा एक नयी उर्जा का संचार कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है I
ऐसे महान व्यक्तित्वों का दिन तो हर रोज ही है!
नमन उन सभी ब्याक्तित्वों को जिन्होंने हमें इस धरती पर चलना, बोलना, पढना, सोचना और समझना सिखाया क्योंकि आज हम जहाँ भी है जैसे भी है उनके बदौलत ही तो है!
दरअसल गुरु को अनेको उपाधियाँ इसी लिए तो दी गयी है क्योंकि मानव के जीवन में गुरु की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है I
हकीकत में गुरु के मार्गदर्शन से ही कम समय में व्यक्ति अपनी मनोकामनाएं पूरी कर लेता है I
गुरु का दायरा सिर्फ स्कूली दिनों में शिक्षा देने तक ही सीमित  नहीं बल्कि काफी विस्तृत होता हैI
जो अनेको रूपों में जीवन भर साथ देता है!
जहाँ एक माँ भी गुरु ही होती है जो अपने बच्चे को ऊँगली पकड़ कर पहला कदम धरती पर रखना सिखाती है I
वहीँ उन अनेको रिश्तों एवं सामाजिक सरोकारों को भी गुरु के नजरिये से देखा जाता है, जो समय समय पर इन्सान को मार्गदर्शन देने और उसके भविष्य को उज्जवल बनाने के जतन करते रहते है! विद्यालय के दिनों के गुरु भी अपने शिष्यों को सफल बनाने के लिए अथक परिश्रम करते है, वे एक तरफ जहाँ एक सच्चे मित्र के रूप में मुश्किल के घड़ियों में भी हौसला अफजाई करते हैं वहीँ दूसरी तरफ हर कदम पर अपने शिष्यों को आचरण का पाठ पढ़ाते और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहते है I
दरअसल कोई भी गुरु ऐसा कदापि नहीं चाहता की उसका कोई भी शिष्य सफलता की उस सीढ़ी को छूने में असफल हो जाये जिसकी उसने कल्पना कर रखी है और जिसके लिए वो दिन रात एक किये हुए है गुरु के लिए तो उसके सभी शिष्य एक सामान ही होते है!
आज के आधुनिक परिवेश में गुरु कई रूपों में प्राप्त होते हैं.
आध्यात्मिक गुरु, शैक्षणिक गुरु, व्यावहारिक और वैचारिक गुरु, राजनैतिक गुरु I
पुराने समय में व्यक्ति किसी एक जातिगत कार्यक्षेत्र में कार्य शील रहता था एवं उसका १ ही गुरु होता था.
राजा का गुरु - राज गुरु.
ब्राम्हण का गुरु - ब्रम्हार्शी

पर आज के परिपेक्ष्य में हमें हर क्षेत्र में गुरु बनाने की जरूरत है....


आज गुरु पूर्णिमा विशेष पर मैं अपने सभी गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ...


गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा I
गुरु साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः II

                                                 

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