सोमवार, 23 जुलाई 2012


कांग्रेस : कुतर्कों का महिमा मंडन 

कुछ प्रश्न उमड़ घुमड़ के मन में धमाचौकड़ी मचाये हुए थे.

और जिज्ञासा को शांत करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है.

बहुत सारे राजनैतिक, पत्रकार और पदाधिकारी मित्रों से मैंने ये कुप्रश्न किये, पेश है उनकी एक बानगी.

प्रश्न१- कांग्रेस देश की सबसे बड़ी और पूरे देश में जनाधार रखने वाली पार्टी है, 
फिर सरकार बनाने में इतनी दिक्कत क्यों?
उत्तर - ये आपस में लड़ना तो बंद करें.
प्रश्न१-अ : बीजेपी में भी तो गुटीय संघर्ष है ?
उत्तर - कम है इतना नहीं है, संघ और बीजेपी के बड़े नेता इस पर नियंत्रण रखते हैं.
प्रश्न१ -ब : कांग्रेस में तो बीजेपी से बड़े और ज्यादा चमक वाले नेता हैं जो ज्यादा सक्षम हैं ?
उत्तर - हैं तो !! पर मुद्दे कहाँ हैं, विचार धारा कहाँ है ?
प्रश्न१-स- वाह भाई वाह, धर्मनिर्पेक्षता और कांग्रेस का इतिहास ?
उत्तर- इतिहास सुनना कौन चाहता है ?
आप सुनेंगे क्या निजाम हैदराबाद के वंशजो से या महाराणा प्रताप के वंशजो से, उनके पूर्वजों की कहानी ?
वाजिद अली शाह के वंशज से फ़ोन पर बात कराऊँ?
मैं बोला : न बाबा न मुझे बक्शो....
कांग्रेस की धर्म निर्पेक्षता उत्तर प्रदेश चुनाव में मुस्लिमों के साथ होती है और और पूर्वोत्तर के किसी राज्य में ईसाईयों के साथ, 
जहाँ हिन्दू धर्म की जरूरत पड़ी वहां उनके साथ.
कुल मिलाकर जहाँ वोट वहां लोट !!
ये कांग्रेस की मजबूरी है और जनता इसे बहुरूपियापन मानती है.
अब लोगों (खासकर उ.प्र के मुस्लिम) को, जहाँ तीसरा विकल्प दिखता है, वहां वोट करते हैं.
धर्मनिरपेक्ष तो सिर्फ वामपंथी हैं.
मैं चुप :
प्रश्न-२-अ- वामपंथी से याद आया वहां तो ममता की सरकार है?
उत्तर: ममता कांग्रेस में थी, प्रणव दा ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया, जनता को तीसरा विकल्प दिखा 
एक दबंग और कर्मठ महिला के रूप में.
टाटा के विरोध ने उन्हें अच्छा कवरेज और समर्थन मिला, और वो सी.एम हैं.
प्रणव दा और सोनिया दाई को आंखे दिखा रही हैं.
मैं चुप :
जनाधार विहीन नेता को नेता बनाया जा सकता है, पर उस समय जब आप सक्षम हों, और आपके पास पर्याप्त समय हो.
प्रणव को फटकार लगाई होती पार्टी ने तो १० साल पहले कांग्रेस की सरकार बन जाती.
प्रति प्रश्न: आप बताओ महाराज, आँध्र में आगे क्या होगा ?
प्रणव दा जैसे कई हैं पार्टी में, और जहाँ नहीं हैं वहां पैदा किये जा रहे हैं.
शीर्ष नेतृत्व विरोध ख़त्म नहीं कर सकता क्या ? 
यू.पी में क्या हुआ ?
प्रति उत्तर: मैं इतना बड़ा राजनैतिक पंडित नहीं हूँ माननीय... 
पर यू.पी में जो हुआ उसका मुझे दुःख है. सोनिया जी और राहुल जी के लोकसभा में हार बुरी लगी. 
प्रश्न२-ब- पर अटल बिहारी और मुरली मनोहर जोशी के क्षेत्रो में भी तो बीजेपी हारी ?
उत्तर- वही तो महाराज में कहना चाहता हूँ, व्यवस्था परिवर्तन चाहती है जनता, 
ये दोनों पार्टियों से जनता ऊब गयी है.
विकल्प तलाशती है ये, मजबूत विकल्प...
प्रश्न२-स- कुछ लोग कहते हैं की अन्ना का प्रभाव था...
उत्तर- प्रभाव नहीं कह सकते पर कुछ असर तो था,
इस यू.पी चुनाव ने संकेत दे दिया है की जनता जागरूक हो गयी है.
प्रश्न२-द- कैसे ?
उत्तर : मुख्तार अंसारी, डी.पी यादव, आपके गोरखपुर वाले सभी हारे.
और राजा भैया कैसे जीते ?     
प्रति उत्तर: भाई वो माया से प्रताड़ित थे तो सहानुभूति मिली.
प्रति प्रश्न : और अखिलेश कितनी बार पिटे और जेल गए.
प्रति उत्तर: १६ बार .
प्रति प्रश्न: सोनिया जी ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा तो अगले चुनाव में उन्हें क्या मिला?
प्रति उत्तर: उन्हें कुछ नहीं ,पार्टी को सत्ता मिली.
ये भारत वर्ष है महाराज, यहाँ सहानुभूति की बड़ी कीमत है.
संघर्ष की भी कीमत है, पर संघर्ष अमूल्य जब होता है जब उसमें सहानुभूति मिल जाती है...
जैसे सोने पे सुहागा !! हा हा हा...
वार्तालाप शेष : क्रमशः 

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