बुधवार, 23 जनवरी 2019

भारतीय परंपराएं और सरकार

#Jallikattu #Peta #परंपराएं #GoI
समझिये संविधान बनने के पहले के भारत को - और उस भारत की आज से तुलना करिये !
बिलकुल ऐसा ही आप औद्योगीकरण के पूर्व की दुनिया और औद्योगीकरण के बाद की दुनिया पर भी चिंतन कर सकते हैं !

अगर आप निज हित और निजी आराम को महत्त्व देते हैं तो आपको आज की दुनिया बेहतर लगेगी ; अगर आप समाज, पर्यावरण और अपनी आने वाली पुश्तों को तजरीह देते हैं तो आपको वह दुनिया अच्छी लगेगी जो आज से ७० साल पहले की थी !

हमने पिछले १०० सालो में पूरी तरह हर उस अवधारणा को तोड़ने की भरपूर कोशिश की है जिसे हम सच मानते रहे हैं और जिसे हम अपने बच्चो के पाठ्यक्रम में पढ़वाते हैं !
हम डार्विन के सिद्धांत को बदलने की कोशिश में हैं ; हम सूर्य से लेकर पानी तक को कब्जे में करना चाहते हैं !
हम डीएनए में घुस रहे हैं ; हम जीव जंतुओं की नयी प्रजाति बना रहे है - हम अपनी नैसर्गिक क्षमताएं छोड़ कृत्रिम क्षमताओं पर आश्रित हो रहे हैं !
सामजिक चिंतन छोड़ - फिर स्वार्थ चिंतन की तरफ अग्रसर हैं !
इस छद्म आधुनिक तकनीकी के कारण कहीं हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है तो कहीं हमारा समाज टूट रहा है; कहीं नए रोग पैदा हो रहे हैं कही बच्चो में अनुवांशिक रोग पैदा हो रहे हैं !
परिवार मान्यताएं, आदर्श इसी छद्म भौतिकता से छिन्न भिन्न हो रहे हैं और हम ही इसे स्वार्थ वश बर्बाद कर रहे हैं और फिर भी हम चाहते हैं की हमारा समाज आदर्श हो; हमारी  वाली पीढियां तरक्की करें !

मानव स्वाभाव है कि वह हर उस उच्च कीर्तिमान को ध्वस्त करना चाहता है जो उसके पहले की पीढ़ी ने स्थापित किया है ! क्रिकेट को ही लें गावस्कर के टेस्ट क्रिकेट में लगाये दोहरे शतक को आज वन डे में सिर्फ आधे दिन में तोड़ दिया जाता है !
पिछले १०० बरसों में हमारे भाग्यविधाताओं ने कमीनेपन के जो स्वर्णिम रिकॉर्ड बनाये हैं उसे १०० गुना बेहतर तरीके से हम आज तोड़ रहे हैं ; आगे की पीढियां हमारे भी रिकॉर्ड तोडेंगी !
जैसे परमाणु बम की इज़ाद करने वाले, दुनिया को आतंक का पाठ पढ़ने वाले आज शांति के लिए संघर्षरत हैं !
वैसे ही हमें भी कुत्सित तरीके छोड़ उच्चतम आदर्शो को स्थापित करना चाहिए जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी उन आदर्शो पर चले और समाज उन्नति करे !
यही होना चाहिए ; आज समाज फैशन के सामान बदलना चाह रहा है- सही दर्ज़ी ढूंढ रहा है जो उसे राजेन्द्र कुमार के स्किन फिट पेंट और शर्ट की जकड़न से आज़ादी दिलाये ;और इसकी जगह राज कपूर की तरह ढीले ढाले कपडे बना दे तो कुछ आराम मिले और कुछ बोरियत कम हो !
हाँ यह सही है की भारत अब बोर हो गया हैं इस पुराने विदेशी नजरिये से - उसे कुछ नया चाहिए और वह नजरिया है हमारा पुराना नजरिया, जो मोदी और संघ उन्हें उपलब्ध करा रहे हैं !
गांव और कुटुंब में रहने वाले हम विदेशी सोच के तहत एकल परिवार की दहलीज पर आ गए हैं; एकल परिवार भी कहीं कहीं इतना एकल हो चूका है की उसमे भी सिर्फ १ ही व्यक्ति बचा है !

अब समय बदल रहा है - संविधान में कुछ जरूरी बदलाव जरूरी हो गए हैं ; काफी सारे पुराने निर्णयों को बदलने का समय आ गया है !
हो सकता है की पिछले ५० सालों में कांग्रेस ने जो सामाजिक सुधार के नाम पर जो सामाजिक मुखिया, पारिवारिक मुखिया परंपरा पर और हमारे संस्कारो पर जो चोट की है उसपर अगले १० सालो तक केंद्र सरकार मरहम लगाती रहे और उन्हें ठीक कर दे!

अंत में यही कहूंगा की आशा से आसमान टिका है !!

#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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रविवार, 13 जनवरी 2019

भारतीयता और पश्चिम...

हिन्दोस्तान की जिसे समझ है, वह जानता है कि इस देश ने अंगुलिमाल को सन्त स्वीकारा है, रावण को हम हर वर्ष जलाते हैं पर उसे प्रकांड पण्डित भी मानते है और रावण रचित शिव तांडव स्त्रोत्र का पाठ भी करते हैं पर राम भक्त विभीषण जिसे लंका का राज्य मिला उसका नाम आज भी धोखे के प्रतीक के रूप में उपयोग करते हैं, कोई अपने बच्चे का नाम विभीषण नही रखता न रावण रखता है, पर रावण के पांडित्य का सम्मान जरूर करता है।
सिद्धार्थ, अशोक जैसे नाम आपको खूब मिलेंगे, अशोक निरा हत्यारा था पर बाद में बदल गया।
गांधी का पारिवारिक जीवन बहुत बुरा था बल्कि आप कह सकते है कि गांधी पत्नी उत्पीड़क और हृदयहीन पिता थे, पर लोग उन्हें आदर्श मानते हैं।
भारतीय परंपराओं में छुप के अपराध करना (कुटिलता) स्वीकार नही है।
वह कार्य तो बिल्कुल स्वीकार्य नही जो आपकी अंतरात्मा स्वीकार न करे।
आचार्य श्रीराम शर्मा ने कहा है जो तुम्हे खुद पसंद न हो वह दूसरो के साथ न करो।
यही तो भारतीयता है, यही तो है हमारा #डीएनए
रिसर्चर्स कहते हैं कि हमारी मजबूत यादे हमारे डीएनए में पैबस्त हो जाती हैं,
हमारे पूर्वजो के गुण हम में होते ही हैं, वे झलकते हैं हमारे काम करने के तरीको में।
इन गुणों को हमारा दिमाग, हमारी जरूरते और कार्य की मांग बदलते (सप्रेस करते) हैं, पर हमारा मूल नही बदलता,
ऐसे ही भारतीयता के मूल में आदर्श हैं, प्रेम है दया है।
जरा जरा सी बात पर लंगर लगाते हिंदुस्तानी आपको दुनिया में हर जगह मिलेंगे।
दूसरो की तकलीफो को दूर करने के लिए अपने उसूलो को तोड़ता हुआ हिंदुस्तानी आपको पूरी दुनिया में मिलेगा।
#रॉबर्ट_ग्रीन के 48 नियम पढ़ कर निकले इन युवाओ के आदर्शो (पिचाई, नूयी, नाडाल) से पूछिये, कि यही रोबर्ट ग्रीन को पूरी दुनिया ने पढ़ा है पर पिचाई से लेकर नाडाल तक में ऐसा क्या है जो बड़ीअमेरिकी कम्पनियो के मालिक भारतीयों को अपनी कम्पनी सौंप रहे हैं।
इस देश में ऐसा क्या है जो स्टीव जॉब्स और जूलिया रोबर्ट को आकर्षित करता है?
क्या कारण है कि कनाडा पर पंजाबीयो का कब्जा सा हो गया है और वह भी प्रेम से, बिना किसी झगड़े और झंझट के और फिर भी पंजाबी पंजाब को ही अपना देश मानते है?
यही वह चीजे हैं जो हमे सोचने को मजबूर करती हैं की हम हैं क्या?
सोचिये - #विभीषण एक भ्रातद्रोही ने ईश्वर #राम की मदद की पर वह हमारे लिए तजात्य है?
वाल्मीकि (जो जघन्य अपराधी थे) ने एक किताब लिखी और पूज्य हो गए?
पृथ्वीराज हार कर, मर कर भी अमर है और विजेता को कोई नही पूछता।
यह रोबर्ट ग्रीन और तुलसीदास का फर्क है, रॉबर्ट जंगल के कानून को परिष्कृत करने की जुगत में हैं और तुलसीदास जंगल को समाज बनाने के लिए आदर्शो को महिमामण्डित कर रहे हैं,
वहीं गीता में कृष्ण कहते है "वीरम भोग्ये वसुंधरा"
और फिर बात आती है "सबै भूमि गोपाल की"
अंग्रेज़ कहते हैं, इतना कंफ्यूशन उफ्फ ?
पर यह भारतीय समझता है कि इन दोनों विरोधाभासों के पीछे का उद्देश्य स्वच्छ समाज बनाने की कोशिश है।
पश्चिम का यह समझना असम्भव है क्योंकि उनके लिए आदर्श, प्रेम, सहकार और परिवार मायने नहीं रखते उनके लिए #जीत ताकत और सत्ता मायने रखती है।
वर्तमान राजनीति की बात करें तो यही फर्क है, वामपंथ और दक्षिण पन्थ की सोच में,
वामपंथी प्रश्नों से आपको उद्वेलित करता है और दक्षिणपंथ आपको आदर्शो की बात करता है।
पश्चिम आपको अपने अधिकारो के प्रति जाग्रत करता है, पर कर्तव्य भुला देता है, जिससे गुस्सा, घृणा बंदूके, ताकत का गलत उपयोग समाज में प्रभावी हो जाते हैं।
जबकि भारत सिखाता है #कर्तव्यों को,
पूरा समाज अगर अपने कर्तव्य करता चले तो अधिकार मांगने की जरूरत किसको है?
हमारे समाज में भूख प्यास और ठंड से आपको बचाने पूरा देश खड़ा है, पर पश्चिम में लोग अपने बाप के साथ भी नहीं खड़े होते।
वे पैसे के साथ खड़े होते हैं, ताकत के साथ खड़े होते है, भाई, बहन, मां, बाप और मित्रो के साथ नहीं।
यही कुछ है जो हज़ारो सालो से हम में नही बदला है और इसीलिए हम आज भी हम हैं 🙏
#अलख_निरंजन
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

हाँ मैं ब्राम्हण हूँ

हाँ मैं ब्राम्हण हूँ, निश्चल हूँ, निष्काम हूँ, निष्पक्ष हूँ,निष्पाप हूँ । हाँ मैं #ब्राम्हण हूँ हाँ मैं #विप्र हूँ।।

कमजोर इतना हूँ कि सबको माफ कर देता हूँ ।
लालची इतना हूँ कि चन्द्रगुप्त को राजा बना देता हूँ ।

डरपोक हूँ,
इसलिए तो पृथ्वी को इक्कीस बार अत्याचारियों से मुक्त करता हूं ।

अनुपयोगी भी हूँ ,तभी तो हड्डियों से वजृ बनवाता हूँ ।

अनपढ हूँ, क्योंकि व्याकरण और गणित को खोज कर लाता हूँ ।

जातिवादी हूँ,
माया,मुलायम,कांग्रेस,भाजपा....पता नहीं कितनो के साथ हूँ ।

आरक्षण का विरोध नहीं करता ,क्योंकि अपनों के ही नाराज होने का डर है।
सरकार से कुछ नहीं मांगता,क्योंकि हिन्दूस्तान कमजोर होने का डर है ।।

बंगलादेश,पाकिस्तान से गायब हूँ, काश्मीर से निष्कासित हूँ ।
फिर भी अखंड भारत का स्वपन देखता हूँ ।

कदम कदम पर ठगा जाता हूँ, फिर भी सर्वे भवंतु सुखिनः का मंत्र गुनगुनाता हूँ ।।क्योंकि .....मैं ब्राम्हण हूँ ।।

इन उच्च जातियों में ऊँचा क्या है  ? संविधान जवाब दे !!!

प्रश्न ये है कि ब्राह्मणों को किस आधार पर ऊँची जाति वाला बोल कर सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है, आज के दौर में ऐसा क्या है ब्राह्मणों में , जो ऊँचा है, सरकारों को ये भी खुलासा करना चाहिए। जबकि ब्राह्मण अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं ।अगर पाठ पूजा करना , पंचांग पढ़ना , हवन करवाना उनके पौराणिक व्यवसाय के कारण सवर्ण जाति कहलाता है, तो मैं बताना चाहता हूँ कि आजकल मंदिर के पुरोहित मंदिर कमेटी के अधीन नौकरी करते हैं ,जिन्हें बहुत ही अल्प वेतन पर रखा  जाता है और मंदिर-कमेटी के सदस्यों के दबाव में रहना पड़ता है। कई पुजारियों पर अब तो  गाली भी पड़ने लगी है , फिर किस प्रकार ब्राह्मण को उच्च बोल कर सरकारी नौकरी में / सरकारी स्कूल में / सरकारी स्कीमों में किसी प्रकार की छूट नही दी जाती ।

ब्राह्मणों की नई पीढ़ी जिन्हें किसी परीक्षा या इंटरब्यू मे कोई रियायत नही मिलती,तो वे अपने पूर्वजों को कोसते हैं कि क्या इस संविधान ने अरबों तुर्कों मुग़लों,पुर्तगालियों के जुल्म सहने का इनाम ,तुर्कों मुगलों द्वारा जब ब्राह्मणो को काटा जाता था(मु. बिन कासिम-सिंध में 14 वर्ष से ऊपर के सभी ब्राह्मणों के कत्ल का आदेश, औरंगजेब द्वारा प्रति दिन सवा मन जनेऊ को तौलने का आदेश- कत्ल या धर्मांतरण द्वारा,पुर्तगालियों द्वारा गोवा में नरसंहार आदि आदि),वेद पुराण ग्रंथों को जलाया जाता था, तो ब्राह्मण ही था जिसे वेद पुराण कंठस्थ थे और जो जुल्म सहन करता हुआ भी छुप छुप कर अपने बच्चों को मंत्र   वेद उपनिषद 16 संस्कार आदि सिखाता रहाथा ,ताकि अपने देश की संस्कृति जिन्दा रह सके और हिन्दू धर्म को बचाया जा सके |जबकि एक हज़ार वर्ष तुर्कों मुगलों और 200 वर्षों अंग्रेज़ों के जुल्म के बावजूद भारतीयों को हिन्दू बनाये रखा और आज उन्ही ब्राह्मणो के खिलाफ साजिशें और अपमान हो रहा है।

हम ब्राह्मण कोई विशेष सम्मान नहीं चाहते ,परन्तु कम से कम सरकारी स्कीमों या निजी कार्य में बराबरी तो मिले , ये कैसी उच्च जाति व्यवस्था है कि उच्च बोल कर प्रताड़ित किया जा रहा रहा है !!!

सरकारें केवल इतना जवाब दे दें - ब्राह्मण / क्षत्रिय / वैश्यों में ऊँचा क्या है और इसका  आधार क्या है ???
इस व्यवस्था ने हमें मजबूर कर दिया है कि हम ब्राह्मण समाज को एकजुट करें और इस व्यवस्था को खत्म करें।

🙏 निवेदन
वन्देमातरम्।
जय श्री राम, जय परशुराम।।
🌹🙏🏻