शुक्रवार, 31 मई 2019

कांग्रेस और गाँधीयो के भय

31 मई 2016 की फेसबुक पोस्ट...
कांग्रेस पर यह लेख मेरे स्वयं के विचार हैं और हर उस व्यक्ति, संस्था, संगठन एवं कंपनी को मैं इसे शेयर करने व छापने का अधिकार इस बाध्यता के साथ देता हूँ कि  वे इस लेख की आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे !!
अवस्थी सचिन
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कांग्रेस भारत का सबसे पुराना राजनैतिक दल है ; वह दल जिसके सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी को भी उनके जीवित रहते उनके ही साथीयो ने चुनौती दी और गांधी ने उस चुनौती को खुले दिल से स्वीकार किया और नेताजी ने जिस चुनाव में गांधी के प्रत्याशी को पूर्ण बहुमत से हराया उस चुनाव को जीतने के बाद भी गांधी को दुखी देखकर नेता जी ने गांधी के चरणों में अपनी जीत की माला डाल दी थी !
जबकि वे पूर्ण बहुमत से चुने हुए अध्यक्ष थे !!
आज वही कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष का तो छोड़ दें प्रदेश और जिला अध्यक्ष का निष्पक्ष चुनाव नहीं करवा पा रही !
क्या हो गया है कांग्रेस को ?
नेहरु के सामने उनकी पार्टी में ही कई चुनौतियां आईं और वे हर बार उस चुनौतियों से लडे और जीते !
नेहरू के बाद इंदिरा ने काफी कमज़ोर शुरुवात की और इंदिरा ने उस मुकाम को हासिल किया जिस मुकाम पर लोग "इंडिया इस इंदिरा एंड इंदिरा इस इंडिया" का नारा लगाने लगे थे !
मोतीलाल से लेकर राजीव तक इस परिवार को कोई भीरु नहीं कह सका - पर आज देश की जनता राहुल और सोनिया को रणछोड़ दास या कायर की उपाधि देती है ?
रणछोड़ दास कैसे ?
यह बड़ा प्रश्न है पर उत्तर बड़ा छोटा सा है !!
वे अपने आपको गांधी नेहरु का वंशज कहते हैं पर उनका कलेजा पार्टी के भीतर भी चुनाव कराने का नहीं है !

आप किसी पार्टी से हों किसी विचार धरा को मानने वाले हों जरा आँख बंद करके विचार करें क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो स्कूल या कॉलेज में दोस्त न बना पाया जिसने कभी हिंदी अखबार न पढे, जो देश में बनी फिल्मों को न समझ पाया हो जिसने प्रेमचंद, रबींद्रनाथ को न पढ़ा हो - जो देश की संस्कृति से वाकिफ न हो वह क्या वह देश चला सकेगा ?
यह एक बड़ा भय है जिससे लड़ने की सोनिया राहुल ने कभी कोशिश नहीं की !

इसी डर के साये में सोनिया ने देश चलाया है और राहुल चलाने का सपना संजो रहे हैं !!

और किसी भी क्षत्रप की कद्दावर छवि ही एक ऐसी चीज़ है जिससे उनके गांधी परिवार को नींद में भी डर लगता है !
डर तो बहुत हैं प्रथम परिवार के मन में जिसे समय समय पर वे जाहिर भी करते रहते हैं - उनमे से कुछ प्रमुख डर हैं !
१- आतंक के सरदारों का डर !
२- कोई उनकी राजनैतिक सत्ता को चुनौती न दे दे इसका डर !
३- विदेश में बैठे बड़े धर्म गुरुओं का डर
४- अपनी राजनैतिक और सामाजिक हैसियत बचाए रखने का डर
५- अपनी अज्ञानता और अशिक्षा का डर
६- अपनी निजिता का डर
७- धर्म, शिक्षा, रिश्ते, बीमारी के उजागर हो जाने का डर
यही वे डर हैं जिनसे सोनिया या राहुल भागते रहे हैं !

और जो व्यक्ति अपने बचकाने डरो से भागे वो कैसे किसी का नेतृत्व कैसे कर सकता है ?

नेतृत्व करने की प्रथम प्राथमिकताओं से जिसे डर लगे वह देश का सबसे बड़ा नेता कैसे हो सकता है ?

कांग्रेस मुक्त भारत की सोच नयी नहीं है - इस सोच को अमली जामाँ पहनाने में सबसे पहला प्रयास "NTR" ने किया और तमिलनाडु को करीब करीब कांग्रेस मुक्त कर दिया !!
ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी ने किया - ममता ने आज के राष्ट्रपति प्रणब दा के खिलाफ झंडा उठाया और कांग्रेस ने और प्रथम परिवार ने उस पर ध्यान नहीं दिया - बस १९९७ में कांग्रेस का तृण मूल एकत्र हुआ और फूल और फल को उसने बंगाल से बाहर कर दिया, उस फूल और फल को जिसका पोषण खुद त्रण और मूल करते थे -
और नयी पार्टी बना डाली जिसका नाम रखा गया
"त्रण मूल कांग्रेस"
इसका शाब्दिक अर्थ था
घाँस/पत्ते और जड़ वाली कांग्रेस -
इस टी एम सी ने फल और फूल वाली कांग्रेस को  बाहर कर दिया जिसका पोषण जड़ और पत्ते मतलब कार्यकर्ता करते थे - बंगाल नया कांग्रेस मुक्त प्रदेश बना !
ऐसा ही नारायण दत्त तिवारी के साथ हुआ उत्तर प्रदेश में और यही आंध्र में वाई एस आर के साथ हुआ !!

यही हो रहा है हर उस प्रदेश में जहाँ पार्टी की मूल (जड़) मज़बूत है और ऐसे क्षत्रप नेता है जिनकी जनता रुपी धरती पर पकड़ है !
पार्टी के प्रथम परिवार को कोई भी क्षत्रप मंजूर नहीं जो अपने दम पर वोट पा सके उन्हें लगता है की देश उन्हें इंदिरा और राजीव के नाम पर वोट देता है !

और पार्टी में कोई क्षत्रप होगा तो उससे प्रथम परिवार को चुनौती मिलेगी-

प्रथम परिवार को चिंतन करना चाहिए कि, जनता ने और कार्यकर्ताओं ने तो इंदिरा और राजीव को भी आइना दिखाया है !!

आज की परिस्तिथि में जनता कांग्रेस से इतनी दुखी नहीं है जितनी सोनिया राहुल और उनके संगी साथियों से है !

दिग्विजय से लेकर तेवारी तक, खुर्शीद, चिदंबरम और राहुल तक जितने भी कांग्रेस के स्पोक्स पर्सन दिखते और छपते रहे है सब से जनता हठधर्मिता की हद तक चिढ़ी हुयी है पर आज भी मनमोहन सिंह के लिए जनता के मन में कोई तीव्र अनादर की भावना नहीं है !

आज कांग्रेस के त्रण मूल कार्यकर्ता को चाहिए की वह अपना स्वयं का नेता खुद चुने और ऐसे नेताओं से मुक्ति पाएं जो हवेलियों के अंदर से राजनीति करते हैं !

आज जरूरत है फिर उस सोच और हिम्मत की जो इंदिरा के पास थी !!

आज जनता नहीं चाहती की हमें वो लोग नेतृत्व दे जिनमे खुद छाती ठोंक के बात करने का माद्दा नहीं है !!

आज जरूरत है पूरे देश में कांग्रेस के क्षत्रपों को एकत्र करने की और एक बिलकुल नयी पार्टी खड़ा करने की !!

जिसमे देश के कद्दावर क्षेत्रीय जननायक हों जो हर उम्र,धर्म और जाति का नेतृत्व करें और जो संकल्प ले की वे मजबूर जनता और मानव मात्र के लिए काम करेंगे देश के लिए काम करेंगे न की तुष्टिकरण और निजी लाभ एवं किसी परिवार ऐ ख़ास के लिए !!

तो शायद कांग्रेस फिर पुराणी प्रतिष्ठा पा सके और उन युवा और अधेड़ कोंग्रेसियो का भविष्य उज्जवल हो जाए जो दशकों से संघर्षरत हैं !!

धन्यवाद
अवस्थी सचिन "जबलपुर"
९३०००३०९०३ /

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यह #MODIfiedIndia नहीं है।

#हथौड़ा_पोस्ट
24 तारीख से देख रहा हूँ प्रबुद्ध और स्थापित लोग लिख रहे है, यह मोदी का इंडिया है, मोदी ने भारत को बदल के रख दिया और ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ 😂
असल मे किसी भी चीज़ को देखने के 3 तरीके हैं।
1- अपने फायदे की नज़र से
2- दूसरे के फायदे की नज़र से
3- निष्पक्ष नज़र से
अधिकतर लोग तीसरे तरीके तक पहुंच ही नहीं पाते।
यह मोदी का भारत नही न ही यह #MODIfiedIndia है, यह वही पुराना चाणक्य, राम, पोरस, विक्रमादित्य, महाराणा और शिवाजी का भारत है।
संविधान के आगमन से इसमे कुछ फर्क आये थे, जो अब सुधर रहे हैं।
नेहरू के आगमन के बाद प्रधानमंत्री के स्वार्थ, देश और प्रजा से बड़े हो गए थे।
#प्रधानमंत्री को राजा के समान अधिकार  नही थे और वह खुद को प्रजा का सेवक मानना नही चाहता था।
5 साल के लिए आने वाला राजा पहले खुद का घर भरना चाहता था।
बस इसीलिए शुरू हुई यह लूट और स्वार्थ की होड़।
4 अंग्रेज़ी अखबार जो लिखते थे वह दिन दो दिन बाद पूरे देश मे छपता था, और देश उसे ही सही मानता था।
और उन अखवारों के खबर नवीसों को जनता हरिश्चंद्र का अवतार मानती थी।
अब #सोशल_मीडिया है, जो खबर छपने से पहले ही दिखा देता है,
अब देश मे 1950 से 2010 की पुरानी व्यवस्था नही है अब सूचनाएं और सत्य 5 इंच की स्क्रीन पर बिखरा पड़ा है।
यह मोदी की नहीं #जिओ और गूगल की देन है।
अब 4 अंग्रेज़ी अखबार, आपकी बेईमानी और धूर्तता नहीं छुपा सकते।
इन अखबारों ने कश्मीरी पंडितो पर होने वाली दरिंदगी छुपाई थी,
अब यह असम्भव हैं।
इसे आप देश या जनमानस के जागरण से न जोड़ लेना, देश 1950 मे भी इतना ही जाग्रत था बस नहीं थी तो मोबाइल की 5 इंच की स्क्रीन और सूचनाएं।
अब उंगलियों की नोक पर खबर का भंडार है, इसीलिए Ravish Kumar और BDUTT की धज्जियां लोग रोज़ उड़ा रहे हैं।
अब आते हैं धार्मिक कट्टरता पर,
1950 में भी धार्मिक कट्टरता, सहिष्णुता और उदारता इतनी ही थी, यह किंचित भी कम या ज्यादा नहीं थी।
बस अगर कुछ कम या ज्यादा था तो वह थी सूचना और उसके पीछे का सत्य।
अगर 1947 में सोशल मीडिया होता तो डायरेक्ट एक्शन डे न हो पाता न गांधी उसे जस्टिफाय कर पाते, न नेहरू के नोबल प्राइस के सपने के चक्कर मे हिंदी चीनी भाई भाई होता, न अटल, कारगिल के बाद पाकिस्तान को माफ कर पाते और बस यात्रा कर पाते।
नेताजी, गायब न होते न शास्त्री जी की मौत एक रहस्य होती।
पूरी दुनिया आज करेक्शन के दौर में है और इस करेक्शन का कारण है इंटरनेट।
भारत #MODIFy नही #नेटिफाई हो रहा है।
हम सतयुग की तरफ बढ़ रहे हैं, अब छल प्रपंचों का दौर समाप्ति की ओर है।
भ्रष्ट आचरण अब कम होंगे और वही चलेगा जो सत्य के ज्यादा करीब होगा।
अब नेता और अधिकारियों को 5 साल का राजा नहीं 5 साल का जन सेवक बनना मजबूरी होने जा रहा है।
इसलिए यह न माने की जनमानस कट्टर हो रहा है बल्कि यह माने की अब नेता जनमानस को मूर्ख नही बना पा रहे 🙏
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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