मंगलवार, 30 जुलाई 2019

धर्म और राजनीति

#हथौड़ा_पोस्ट
धर्म और राजनीति :
धर्म का राजनीति में प्रवेश राजनेताओ को पसंद नहीं। आखिर क्यूँ?
सोचिये :
अगर एक शंकराचार्य/ दंडी स्वामी/संत/आचार्य सत्तासीन नेताओ को निर्देशित करने लगे तो क्या अनैतिक आचरण और भ्रष्टाचार बचेगा?
क्या बलात्कारी नेता, हत्यारे नेता सत्ता चला सकेंगे?
एक व्यक्ति जिसे धार्मिक व्यवस्था के आधार पर कुटिया में रहना है, खूब यात्राएं करनी है, धन और तामसी व राजसी चीजो से परहेज करना है अगर वह सत्ता को निर्देशित करेगा तो क्या उसे सत्ता खरीद पाएगी?
सत्ता सिर्फ उसे खरीद पाती है जिसकी जरूरते होती है, वैराज्ञ धारी को कौन खरीद सकता है?
जो 9 महीने देश भर में यात्रा करेगा, 3 महीने स्थिर रहेगा उसका जनता से जुड़ाव होगा।
और वह चाहे तो सत्ता को चुनौती दे सकता है, ऐसा चाणक्य ने किया था।
और इसी बात का डर अंग्रेजो को था।
इसीलिए उन्होंने सबसे पहले सत्ता को निर्देशित करने वाली धार्मिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया, फिर ब्राह्मणों को फिर कांग्रेस आयी तो उसने कुटुम्ब प्रमुख, समाज प्रमुख और ग्राम प्रमुखों की व्यवस्था उलट दी।
कांग्रेस ने अंग्रेजो की व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया, क्योंकि नेहरू को अपनी व्यवस्था बिगड़ने का डर था और अब यह डर नेहरू गांधी परिवार को है।
आज अगर हम दुखी हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि निरंकुश और लालची सत्ता के ऊपर कोई निष्पक्ष  और ऐसा व्यक्ति या समूह नहीं है जो निस्वार्थ और निर्भीक होकर जनहित के बारे में सोच सके।
यह कोशिश #धर्मसम्राट_करपात्री_जी_महाराज ने की थी पर #इंदिरा ने संतो पर गोलियां चलवा दीं।
आज भी अगर धर्म शासन व्यवस्था को निर्देशित करने लगे तो समस्याएं हल हो जाएंगी।
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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सोमवार, 29 जुलाई 2019

मोदी और मुस्लिम तुष्टिकरण

#हथौड़ा_पोस्ट
बड़ा गड़बड़ है भई,
भयंकर संघी भी यह मान रहे हैं कि @BJP4INDIA
मुस्लिम तुस्टीकरण के रास्ते चल पड़ी है।
सरकार संघ की विचारधारा से भटक गई है।
यह सच नहीं है, यह अखबारों की खबरों और प्रोपोगेंडा का असीमित प्रभाव है।
मैं इन प्रचण्ड संघियो से असहमत हूँ।
संघ पिछले 65 सालो में देश की बड़ी संस्थाओ में घुसने में असफल था, अटल जी आडवाणी जी ने सरकार या बड़े संवैधानिक पदों में हार्डकोर संघियो को बिठाने की हिम्मत नही की, मोदी ने राष्ट्रपति से लेकर कई राज्यो के मुख्यमंत्री ही संघ से उठाकर बनाये।
अटल जी के समय संघ और सरकार का झगड़ा हमेशा खबरों में रहा, दत्तोपंत ठेंगड़ी तो सरकार की नाक में नकेल डाले रहे।
ऐसी एक भी घटना पिछले 5 सालों में नहीं हुई।
पहले संघ सरकार की गलतियां चिन्हित करता था, पर बिहार चुनाव में तो भाजपा ने संघ प्रमुख के बयान पर ही हार का ठीकरा फोड़ दिया।
यह परिवर्तन है, बड़े भाई के साथ जब छोटा भाई बराबर से कमाने लग जाये तो वे दोस्त हो जाते हैं।
यही हो रहा है, संघ और भाजपा भरपूर सामंजस्य के साथ विस्तार कर रहे हैं। सरकार में दोनों की भागीदारी है, संस्थागत संवैधानिक संस्थाओं में संघ के लोग भरे जा रहे हैं, यह संघियो को समझना चाहिए।
अब रही हिंदुत्व की विचारधारा से भटकने की बात तो
संघ में 2 वैचारिक धड़े हुए हैं, एक परमपूज्य गोलवलकर जी, जिनके बाद संघ में कोई गुरु नहीं हुआ।
दूसरी विचारधारा है वीर सावरकर की, हिंदुत्व की दोनों विचारधाराओ में बस एक फर्क है सावरकर का हिंदुत्व ज्यादा चतुर है वस्तुनिष्ठ है, ज्यादा हिंसक है, और गोलवलकर का कम।
याद करिये भागवत जी का वह बयान जिसमे उन्होंने कहा था संघ अब गोलवलकर जी के विचारों से बहुत आगे आ गया है।
तो क्या संघ सावरकर की विचारधारा के ज्यादा नजदीक हो रहा है?
हाँ यह सच है अब संघ चतुराई से काम कर रहा है।
व्यवस्था बदल रही है, अटल जी ने बड़ी मुश्किल से सावरकर की फ़ोटो संसद के सेंट्रल हॉल में लगवाई थी, अब मोदी छाती ठोंक कर सेल्युलर जेल घूम रहे हैं, सावरकर को महिमा मंडित कर रहे हैं।
क्या यह हिंदुत्व की विचारधारा का और कट्टर होना नहीं है?
राजनीति में संदेश और प्रतीकों का बड़ा महत्व है और मोदी ने सेल्युलर जेल से संदेश दे दिया है।
आप प्रतीकों के लिए आप संसद में, सत्तापक्ष में भगवा कपड़े पहने हुए सांसदों को गिन लें।
अटल जी ने कहा था जो एक बार स्वयम सेवक हो गया वह मरते दम तक स्वयम सेवक ही रहता है, अपनी सोच नही बदल सकता।
इसलिए निश्चिंत रहें, मोदी ने हुड़दंग रोकी है, गंभीर लोगो को नहीं रोका।
वजीफा दिया है तो मैकाले की शिक्षा पाने वालों को दिया है देवबंदियों को नहीं।
लेफ्ट से आप मल्लयुद्ध करके नहीं जीत सकते, लेफ्ट/सुडो सेक्युलर/ लिबर्ल्स से जीतने के लिए वैचारिक रूप से छद्म युद्ध ही करना पड़ेगा, जो वीर सावरकर की यू एस पी है, बस यही छद्म युद्ध चल रहा है।
एक बात और हिंदुत्व की स्थापना के पहले धर्म की स्थापना और उसका कैडर बनना जरूरी है।
उसपर भी काम चल रहा है।
जनजागरण ही तो संघ की यू एस पी है।
और अगर भागवत जी भाजपा से सहमत है तो भाजपा सही रास्ते पर है किसी को कोई चिंता करने की जरूरत नहीं।
मेरा अपना मानना है कि संघ पैसे और सत्ता के लिए काम नहीं करता वह विचारधारा और लक्ष्य के लिए काम करता है।
वह बिल्कुल वैसे ही एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है जैसे आपके बच्चे डॉक्टर बनने के पहले, 5वी से 8वी तक संस्कृत पढ़ते हैं।
अभी संघ संस्कृत पढ़ रहा है 😜
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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मंगलवार, 23 जुलाई 2019

नेतागिरी : एक कठिन पेशा

नेता और नेतागिरी बड़ी कठिन चीज है।
यहां आपको ऐसी समझ चाहिए जो -
1- रॉकेट वैज्ञानिक की बात भी समझ सके और अनपढ़ की भी।
2- आप धनिक वर्ग को भी समझ सकें और निर्धन को भी।
3- आप क्षेत्र, राज्य और राष्ट्र की आवश्यकताओं को अलग अलग कर के देख सकें।
4- आपका सहृदय होना भी उतना ही जरूरी है जितना कुटिल होना।
5- आपको ए सी में भी आनंद आना चाहिए और गर्मी की चिलचिलाती धूप में भी।
6- जीत की खुशी और हार के गम से आपको निर्पेक्षय होना चाहिए।
7- घर और समाज दोनों की समान रूप से जिम्मेदारी उठाना आपका फ़र्ज़ है।
8- वंचित वर्ग और समर्थ वर्ग से आपको समान प्रेम होना चहियर।
मतबल : नेता को निरपेक्ष होना ही पड़ेगा अन्यथा उसे नेपथ्य में जाने में देर नही लगेगी।

#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

रविवार, 14 जुलाई 2019

भारतीयता और रोमांस (आसक्त प्रेम)

प्रेम विवाह 😂

कहां है प्रेम विवाह सनातन में?

कृपया बताएं...

जुलाई 14, 2019

रोमांस का अंग्रेजी तर्जुमा है - A feeling of excitement and mystery of love. This is some where near to lust. The indian Love one is with liabilities, sacrifices with feeling of care & love. The word excitement and mystery has not liabilities, sacrifices with feeling of care.


प्रेम का अंग्रेज़ी तर्जुमा - An intense feeling of deep affection.


मैंने एक फौरी अध्यन किया भारतीय पौराणिक इतिहास का !

बड़ा अजीब लगा - समझ में नहीं आया यह है क्या ?

यह बिना रोमांस की परम्परायें जीवित कैसे थी आज तक ?

और आज इनके कमजोर होने और रोमांस के प्रबल होने पर भी परिवार कैसे टूट रहे हैं ?

भारतीय समाज में प्रेम का अभूतपूर्व स्थान है पर रोमांस का कोई स्थान नहीं रहा ?

हरण और वरण की परंपरा रही पर परिवार छोड़ कर किसी से विवाह की परंपरा नहीं रही !

हरण की हुयी स्त्री उसके परिवार की हार का सूचक थी और वरण करती हुयी स्त्री खुद अपना वर चुनती थी पर कुछ शर्तो के साथ पूरे समाज की उपस्तिथि में !

रोमांस की कुछ घटनाएं कृष्ण के पौराणिक काल में सुनने में आती हैं पर उन पर धर्म शास्त्रियो का विरोध भी है, पर उनमें से किसी भी घटना में कही भी विवाह का जिक्र नहीं है !

रुक्मणी हरण का जिक्र है ; मीरा के प्रेम का जिक्र है पर रोमांस का जिक्र मुझे कहीं देखने में नहीं मिला आपको यदि मिले तो अवश्य बतायें !

प्रेम, वात्सल्य का भरपूर उल्लेख है ; वचन और कर्तव्यपरायणता का भरपूर उल्लेख है !

गांधारी से ले कर सीता तक, कैकई से लेकर मंदोदरी तक के वचन का और राम से लेकर श्रवण कुमार तक, सीता से लेकर लक्ष्मण की पत्नी तक की कर्तव्यपरायणता हमें भरपूर देखने को मिलती है पर आज का रोमांस कहीं नहीं है !

शिव की पत्नी पार्वती का विवाह भी वरण ही माना जायेगा और पति के सम्मान में अग्नि स्नान कर्तव्य था!!

शिव का तांडव प्रेम है पर यह अंग्रेजों का रोमांस तो बिलकुल नहीं !!

अविवाहित कन्या का किसी को देखकर पसंद कर लेना और फिर उसे पाने में जमीन आसमान एक कर देने का उदाहरण शिव और उमा के प्रसंग में मिलता है और भीष्म पितामह का आजीवन कुंवारा रहना भी कथाओं में है !!

पर कहीं भी समाज या परिवार की अनिक्षा से पुरुष के विवाह का प्रकरण नहीं मिलता !!

१ प्रकरण मिलता है सुभद्रा का पर सुभद्रा और उनके भाई ने कृष्ण को सुभद्रा हरण के लिए मनाया था !!

पत्नी भक्ति का भी १ प्रकरण मिलता है कालजयी कवि कालिदास का - पर उसे भी तिरस्कार की नज़रो से देखा गया !! (यही १ प्रकरण रोमांस का है)

भारतीय पौराणिक कथाओं में पत्नी प्रेम के १०० उदाहरण हैं और पति प्रेम के १००० पर पूरा पौराणिक काल #आसक्त_प्रेम (रोमांस) से शून्य है !!

विशुद्ध प्रेम के उदाहरण की अगर हम बात करें तो राम का सीता से, गांधारी का कौरव राज से ; शिव का उमा से दिखायी देता है पर यह प्रेम आसक्त नहीं है यह प्रेम कर्तव्य निष्ठ है, किसी ने जंगल जाना स्वीकार किया किसी ने आँखों पर पट्टी बंधी !!

किसी ने पिता के आदेश को माना और उसकी पत्नी ने भी इसे स्वीकार किया !

#राक्षसराज रावण ने अपनी पत्नी को दिया वचन निभाया और सीता को स्पर्श भी नहीं किया !

राम ने सीता हरण के अपराधी का कुल समेत नाश किया !

लक्ष्मण ने अपनी पत्नी की मर्यादा रखी और #सूर्पनखा की नाक काट ली !

शिव ने तो पार्वती के प्रेम में श्रृष्ठि के विनाश की व्यवस्था कर दी ; जो सदैव सराहनीय है !!

कालिदास ही हुए हैं जिनके प्रेम को हम प्रेम नहीं रोमांस कह सकते हैं पर इस रोमांस के कारण उन्हें बड़ा अपयश भोगना पड़ा !!

भारतीय पुरुष प्रेम कर सकता है और करता भी है ; पर यह प्रेम कई हिस्सो में बना होता है ; यह #आसक्त हो ही नहीं सकता !

यह पिता का प्रेम भी होता है, यह माँ के लिए भी होता है यह भाई और बहन के लिए भी होता है तभी तो परिवार संगठित होता है ?

सब साथ होते हैं तो ताकत होती है समस्याओं का प्रतिहार बेहतर होता है !

और जीवन भर का साथ होता था !!


अब आते हैं आसक्त प्रेम पर - जो पश्चिम से आ रहा है जिसमे #आसक्ति है #अपेक्षाएं है पर #कर्तव्य नहीं हैं - इसमें अधिकार कोर्ट देता है - व्यवस्थाएं देता है कि आधी संपत्ति का मालिकाना हक़ और जीवन भर भरण पोषण, अधिकारों का निर्धारण कोर्ट करता है पर कर्तव्यों का निर्धारण नहीं करता?

यहीं गड़बड़ है।

इसी आसक्त प्रेम में रेखा जैसी सुंदरी की कई शादियां टूटती हैं और इसी आसक्त प्रेम में ऋतिक रोशन का तलाक़ होता है और यही आसक्त प्रेम सिल्क स्मिथा को आत्महत्या को मजबूर करता है !

इस आसक्त प्रेम से इतर समर्पित प्रेम की तलाश में सलमान कुवंरा है और आमिर इसी आसक्त प्रेम के लिए परफेक्शनिस्ट की तरह परफेक्ट लड़की की तलाश में लगे रहे जो मैडम राव के रूप में पूरी हुयी की नहीं ये वही जाने !!

अब उपसंहार यह है जिस भारतीय पुरुष के डीएनए में हमारे पूर्वजो ने रोमांस छोड़ा ही नहीं है तो वह रोमांस कर कैसे सकता है?

हमारा डीएनए तो कर्तव्यों और प्रेम से भरा है यह कैसे अधिकार और रोमांस को स्वीकार करेगा?

और जो इस आसक्त प्रेम को पाने की कोशिश करेगा उसे अगर कोई ज्यादा आकर्षण युक्त साथी प्राप्त हो तो वह क्या करे ?

रोमांस में प्रेम के समान कर्तव्य तो होते नहीं वह तो #लस्ट का रिश्तेदार है।

संवैधानिक मान्यताएं कहती हैं की हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह की छूट है - और विवाह विच्छेदन की भी ! (यहाँ कोर्ट एक तरह से परिवार विखंडन और अनैतिकता को बढा रहा है )

पिता की जवाबदारी पुत्र या पुत्री के लिए १८ साल है - पर इस मान्यता को कोई पुत्र/पुत्री या पिता नहीं मानता जबकि वैवाहिक कानूनों में सभी अपनी अपने स्वार्थ और सुविधा के हिसाब से इसकी विवेचना करते हैं और सभी इसके लिए कानूनन अधिकारी है और इन्ही अधिकारों के लिए लड़ते हैं ?

इसका उपचार क्या है यह हमें सोचना पड़ेगा !

संविधान की रचना के पूर्व हर पत्नी, पति और उसकी ससुराल की जवाबदारी होती थी. अब आधी अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा स्त्रियां अपने भाई, पिता या अगले पति की जिम्मेदारियां होती हैं !

हर पुरुष की जिम्मेदारी उसका परिवार होता है ; पर अब इसमें उसकी #एक्स भी जुड़ गयी है अब रिश्ते सौदे हो गए हैं ; ज्यादा बेहतर, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा अमीर इसकी प्रमुख आर्यहतायें हैं !

BDUTT ने शायद ३ शादिये की - पर इसकी गारण्टी नहीं की वे अंतिम समय किसके साथ काटेंगी !!

न ही आमिर का और सैफ का कोई भरोसा है !

हाँ यह भी हो सकता है की ये अपना जीवन पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वृधाश्रम या नौकरों के भरोसे काटें !

वृद्धाश्रम का जीवन हमारे संस्कारो में कभी न था, लेकिन अब है।।

शायद इसका कारण ही यही था कि हमारे पूर्वजों ने रोमांस नहीं किया या आसक्ति की तीव्रता के प्रभाव में आकर विवाह नहीं किये, किसी एक व्यक्ति की आसक्ति में उन्होंने परिवार #विच्छेद नहीं किया, उन्होंने परिवार के हर व्यक्ति के साथ साथ अपने परिवार के संगठन को भी महत्त्व दिया !!

जो भी था पर वह समय बेहतर था !!

यह मेरे निजी विचार हैं और संशोधन के लिए सभी के सामने पेश हैं !!

अगर असहमत हों तो कमेंट करें अगर सहमत हों तो कोई बात ही नहीं है !!


#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज