सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

पिता का वचन : कहानी

प्रिय श्री संजीव जी की लिखी इस यथार्थ परक और संवेदनशील कहानी को मैं साभार अपने ब्लॉग मे डाल रहा हूँ. संजीव जी कोटि कोटि धन्यवाद गरीब आदिवासी की वेदना से अवगत करने के लिए.... आपका ही आलोचक पिता का वचन कहानी : संजीव तिवारी चूडियों की खनक से सुखरू की नींद खुल गई । उसने गहन अंधकार में रेचका खाट में पडे पडे ही कथरी से मुह बाहर निकाला, दूर दूर तक अंधेरा पसरा हुआ था । खदर छांधी के उसके घर में सिर्फ एक कमरा था जिसमें उसके बेटा-बहू सोये थे । बायें कोने में अरहर के पतले लकडियों और गोबर-मिट्टी से बने छोटे से कमरानुमा रसोई में ठंड से बचने के लिए कुत्ता घुस आया था और चूल्हे के राख के अंदर घुस कर सर्द रात से बचने का प्रयत्न कर रहा था । जंगल से होकर आती ठंडी पुरवाई के झोंकों में कुत्ते की सिसकी फूट पडती थी कूं कूं । सुखरू कमरे के दरवाजे को बरसाती पानी की मार को रोकने के लिए बनाये गये छोटे से फूस के छप्पकर के नीचे गुदडी में लिपटे अपनी बूढी आंखों से सामने फैले उंघते अनमने...

प्रतिव्यक्ति आय और सरकार.......

प्रतिव्यक्ति आय और सरकार....... भारतीय अर्थव्यवस्था का आंकलन हमेशा से अर्थ शास्त्री करते रहे हैं और उसे सरकारें अपने नफे और नुकसान से जोड़ती आई हैं, राष्ट्रीय आय, प्रतिव्यक्ति आय जैसे कुछ शब्दों का उपयोग सरकार हमेशा से भ्रम फैलाने के लिए करती हैं.... राष्ट्रीय आय वह आय होती है जिसमें सारे देश के द्वारा अर्जित आय का योग होता है . और प्रतिव्यक्ति आय राष्ट्रीय आय मे जनसंख्या का भाग देने से प्राप्त होती है. सरकारें राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय को जानता की तरक्की से जोड़ कर देखती हैं. आज देश की ७५% भूमि २५% लोगों के पास है और ७५% लोग २५% जमीन के मालिक हैं. यही हालत उद्योग जगत की है यहाँ १५० परिवारों के पास देश की आधी से ज्यादा उत्पादन इकाइयां हैं और बाकि पूरे हिन्दुस्तान के व्यव्सायीयों के पास आधी से भी कम. आज़ादी के बाद ३ दशकों तक विकास दर ३.५% थी, ८० मे ३%, ९० मैं यह ५.४% रही, २००० से २००७ सन तक ६.९% प्रति वर्ष रही. प्रति व्यक्ति आय ५% प्रतिवर्ष बड़ी. लेकिन विकास दर बदने से न तों बेरोजगारी कम हुई न गरीबी. सरकारी आंकडे बताते हैं की उत्पादन बड़ा है लेकिन रोज़गार कम हुए हैं. इसका कारण पूँज...