AI, उजड़ती नौकरियाँ और सहकारी समाधान: 2035 के शहर की पड़ताल
2035 का शहर : जब मशीनें काम करेंगी।। ज़रा सोचिए, साल 2035 है। सुबह का अख़बार अब भी छपता है, चाय अब भी बनती है, पर बहुत कुछ ख़ामोशी से बदल चुका है। दफ़्तर की वह सीट, जहाँ कभी कोई जूनियर अकाउंटेंट बैठकर हिसाब मिलाता था, अब खाली है, काम एक AI मॉडल कर रहा है, वह भी चंद सेकंडों में। यह कोई विज्ञान-कथा नहीं, यह उस बदलाव की झलक है जो पहले ही शुरू हो चुका है। सवाल वही, जवाब से पहले एक ईमानदार सोच जब भी हम भविष्य पर बात करते हैं, दो तरह के लोग मिलते हैं। एक वो जो कहते हैं "AI तो सब कुछ खा जाएगा", और दूसरे वो जो कहते हैं "कुछ नहीं होगा, यह भी बस एक और तकनीक है जैसे कंप्यूटर आया था"। सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं है, और उसे समझने के लिए आँकड़ों और तर्क दोनों की ज़रूरत है, सिर्फ़ डर या सिर्फ़ भरोसे की नहीं। आज दुनिया की क़रीब 56 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है, और यही शहर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से को चलाते हैं। यानी अगर AI का असर कहीं सबसे पहले और सबसे गहरा दिखेगा, तो वह यही शहर होंगे, दफ़्तर, अस्पताल, अदालतें, स्टूडियो, बैंक। कौन बचेगा, कौन बदलेगा पहला सच यह...