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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हाँ मैं ब्राह्मण हूँ!!

                ॥ हाँ, मैं ब्राह्मण हूँ ॥ X Or Twitter शास्त्र संभाले मेधा से, संस्कृति की लौ जलाई है, अब्राहमिक झंझावातों में, मैंने अस्मिता बचाई है। क्या आक्रांता की शक्ति ने, मेरा स्वर कभी रोका था? क्या दीनता की बेड़ियों ने, मेरा संकल्प तोड़ा था? कहलाया मैं सर्वशक्तिमान, मति का मैं विस्तार रहा, फिर क्यों ये निर्धनता झेली, क्यों रिक्त मेरा भंडार रहा? क्यों मुझ पर 'पक्षपाती' होने के, तीखे बाण चलाए हैं? ये प्रश्न आज भी ज्वलंत हैं, जो सम्मुख मेरे आए हैं। संवैधान के इस युग में जब, नियम पृष्ठ पर ढलते हैं, सत्ता के गलियारों में, बोलो! कितने 'सच्चे' पलते हैं? कौन यहाँ ब्रह्मचारी है? कौन यहाँ निष्पक्ष खड़ा? सत्ता की इस चौखट पर, कौन धर्म से नहीं बड़ा? शास्त्रों में गूँजे श्री राम, संविधान कहता मै शक्तिमान, मेरे डंडे में है वह ताप, जिसके आगे शिव भी शांत। एक तरफ सहस्राब्दी का, संस्कृति-सम्मत स्थायित्व रहा, दूजे ने सत्तर वर्षों में, संकट में डाला अस्तित्व यहां। मैं पूछता हूँ आज, इन आधुनिक संस्थानों से, क्या शेष बची है मानवता, इन सत्ता-अभिमानों से? क्या सादगी, ...

सुनहरा पिंजरा या नई गुलामी?

  'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है।  मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...

₹10 करोड़ का प्रोजेक्ट, 0 नकद निवेश

  संलग्न दस्तावेज बिना नकद निवेश की चक्रीय ग्रामीण परियोजना? NCP 2025 पर आधारित एक भारतीय गांव के 5 क्रांतिकारी विचार जो हमारी अर्थव्यवस्था को बदल सकते हैं जब हम ग्रामीण विकास के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर एक ही तस्वीर दिमाग में आती है: ऐसी परियोजनाएँ जो इरादों में तो नेक होती हैं लेकिन हमेशा अनुदान (grants) पर निर्भर, तकनीकी रूप से साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। उन्हें सामाजिक लागत (social cost) के रूप में देखा जाता है, न कि आर्थिक इंजन के रूप में। प्रचलित धारणा यह है कि बाहरी भारी-भरकम फंडिंग और कॉर्पोरेट स्वामित्व के बिना किसी गांव में बड़े पैमाने पर लाभदायक बुनियादी ढांचा बनाना असंभव है। हमने हाल ही में एक ऐसा दस्तावेज़ बनाया, जो इन धारणाओं को पूरी तरह से तोड़ देता है। यह किसी थिंक टैंक का सैद्धांतिक शोध पत्र नहीं था, बल्कि मध्य प्रदेश, भारत के एक गांव का विस्तृत परियोजना प्रस्ताव था। इसे "मां रेवा इंटीग्रेटेड गौ-ऊर्जा मॉडल" कहा गया है। यह एक आत्मनिर्भर, ग्राम सभा (समुदाय) के स्वामित्व वाली सहकारी समिति (cooperative) की योजना है जो सामाजिक रूप से परिवर्तनकारी ह...