॥ हाँ, मैं ब्राह्मण हूँ ॥
शास्त्र संभाले मेधा से, संस्कृति की लौ जलाई है,
अब्राहमिक झंझावातों में, मैंने अस्मिता बचाई है।
क्या आक्रांता की शक्ति ने, मेरा स्वर कभी रोका था?
क्या दीनता की बेड़ियों ने, मेरा संकल्प तोड़ा था?
कहलाया मैं सर्वशक्तिमान, मति का मैं विस्तार रहा,
फिर क्यों ये निर्धनता झेली, क्यों रिक्त मेरा भंडार रहा?
क्यों मुझ पर 'पक्षपाती' होने के, तीखे बाण चलाए हैं?
ये प्रश्न आज भी ज्वलंत हैं, जो सम्मुख मेरे आए हैं।
संवैधान के इस युग में जब, नियम पृष्ठ पर ढलते हैं,
सत्ता के गलियारों में, बोलो! कितने 'सच्चे' पलते हैं?
कौन यहाँ ब्रह्मचारी है? कौन यहाँ निष्पक्ष खड़ा?
सत्ता की इस चौखट पर, कौन धर्म से नहीं बड़ा?
शास्त्रों में गूँजे श्री राम, संविधान कहता मै शक्तिमान,
मेरे डंडे में है वह ताप, जिसके आगे शिव भी शांत।
एक तरफ सहस्राब्दी का, संस्कृति-सम्मत स्थायित्व रहा,
दूजे ने सत्तर वर्षों में, संकट में डाला अस्तित्व यहां।
मैं पूछता हूँ आज, इन आधुनिक संस्थानों से,
क्या शेष बची है मानवता, इन सत्ता-अभिमानों से?
क्या सादगी, क्या धर्म बचा है? क्या शुचिता की धार बची?
यदि नहीं, तो सोचो—मुझसे कैसे, धर्म की पतवार बची?
तुमने कैसी पोथी पाई, जिसने बस अनाचार दिया?
मानव के मन में मानव का, विद्वेषों का सार भरा?
अपनी बुद्धि को देखो, इस समाज को देखो,
जर्जर होती मर्यादा और, पतित होते समाज को देखो।
सोचो! क्या तुम रच पाओगे, ऐसा कोई शासनतंत्र?
जो सात्विक हो, निष्पक्ष खड़ा हो, जिसका हो निस्वार्थ मंत्र।
आसक्ति जहाँ न हो 'जर' की, 'जोरू' और 'जमीन' निष्काम हो,
बस चिंता हो सर्वांगीण—विकास और दीन-हीन की पहचान।
क्या गढ़ पाओगे आदर्श ऐसा, जो दान-पुण्य पर पलता हो?
जो त्याग मोह सब कंचन का, कुटिया में भी हँसता हो?
जिसके हाथों में सौंप सकूँ; मैं—अपना गौरव, अपना मान,
मेरा सनातन, मेरा भारत, मेरा भव्य हिन्दुस्तान!
रचयिता
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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