सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कुछ शेर कुछ गज़ले...


कुछ शेर और गज़ले जो मुझे पसंद हैं...
शायद आप को भी पसंद आयें...

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,
मिल जाये तों मिटटी है खो जाये तों सोना है,
अच्छासा कोई मौसम तनहा सा कोई आलम,
हर वक़्त का रोना तों बेकार का रोना है,
बरसात का बादल तों दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है,
गम हो के ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं,
फिर रस्ता ही रस्ता है न हँसना है न रोना है,
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,

---0---

जबसे हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए II
हुस्न पर निखार आ गया, आईने स्याह हो गए II
आँधियों की कुछ खता नहीं, हम ही दर्द -ऐ- राह हो गए II
दुश्मनों को चिट्ठियाँ लिखो, दोस्त खैर ख्वाह हो गए II
जबसे हम तबाह हो गए, तुम जहाँपनाह हो गए II

---0---

हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ,
इधर से गुज़ारा था सोचा सलाम करता चलूँ,
निगाहों दिल की यही आख़िरी तमन्ना है,
तुम्हारी जुल्फ के साये मे शाम करता चलूँ,
उन्हें ये जिद कि मुझे देख कर किसी को न देख,
मेरा ये शौक कि सबसे कलाम करता चलूँ,
ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन,
अब आ गया हूँ दो दिन कयाम करता चलूँ
हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ,
इधर से गुज़ारा था सोचा सलाम करता चलूँ,

---0---

तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं, ऐसी तनहाई का ज़वाब नहीं,
गाहे ब गाहे इसे पढ़ा कीजे, दिल से बहतर कोई किताब नहीं,
जाने किस किस की मौत आई है, आज रुख पे कोई नकाब नहीं.
वो करम उंगलिओं पे गिनते हैं, जुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं,
ऐसी तन्हाई का ज़वाब नहीं....तुम नहीं गम नहीं शराब नहीं,

---0---

दिल ही तों है न संग ओ खिश्त, दर्द से भर न जाये क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों,
दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आसमान नहीं
बैठे है रह गुज़र पे हम, गैर हमें उठाये क्यूं
हाँ वो नहीं खुदा परस्त, जाओ वो बे वफ़ा सही,
जिसको हो दीनो दिल अज़ीज़, उसकी गली मे जाये क्यों.
ग़ालिब इ खस्ता के बगैर कौनसे काम बंद हैं
रोइए जार जार क्या कीजिये हाय हाय क्यों,
दिल ही तों है न संग इ खिश्त, दर्द से भर न जाये क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों,

---0---




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वैश्विक व्यवस्था को पर्यावरण संरक्षण हेतु सांस्कृतिक विकल्प

सवाल पूछने का समय: अगर हम अपने समय और समाज को ज़रा ठहरकर देखें, तो यह समझने में देर नहीं लगेगी कि कोई अजीब-सी दौड़ लगी है। भाग-दौड़, होड़, लाभ-हानि, सत्ता, बाजार~  यह शब्द, आज सब कुछ साधने वाले शब्द बन चुके हैं, सारे मुद्दे और बहसें गोया इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं।  जब आप सवाल करते हैं कि "क्या यह वैश्विक व्यवस्था मानव समाजों, उनकी आस्थाओं, मूल्यों और सांस्कृतिक आदर्शों को नजरअंदाज करती है?", तो उसका सीधा सा उत्तर निकलेगा~ हाँ, और यह सब बड़ी सुघड़ता के साथ, बड़ी सधी नीति के साथ, लगभग अदृश्य तरीके से होता आ रहा है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि कौन सी व्यवस्था पिछली सदी में कैसी थी, क्योंकि अब तो यह नई शक्लें ले चुकी है~ तकनीक की शक्ल में, विकास की शक्ल में, नव-मानवतावाद की शक्ल में, और कभी-कभी खुद "मानवता" के नाम का झंडा लेकर भी!  सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं और भाषणों के बीच कहीं हमारा पर्यावरण, हमारी सांस्कृति प्राकृति और हमारी अपनी परंपराएं बची रह गई हैं? "ग्लोबल ऑर्डर" और उसकी ताकत वैश्विक शासन व्यवस्था या जिसे fancy शब्दों में "ग्लोबल ऑर्डर" क...

ब्रह्म मुहूर्त: सनातनी ज्ञान जो दुनिया बदल सकता है; स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर एक गहन नजर

 सनातनी शास्त्र ; अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर एक गहन नजर क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक साधारण आदत; सुबह सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले जागना और रात को जल्दी सो जाना; पूरी दुनिया को बचा सकती है?  हिंदू सनातनी शास्त्रों और आयुर्वेद की यह प्राचीन परंपरा न सिर्फ व्यक्तिगत स्वास्थ्य को मजबूत करती है, बल्कि अगर इसे वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए, तो बिजली की भारी बचत, बीमारियों पर खर्च में कमी और कार्बन क्रेडिट से कमाई जैसे लाभ मिल सकते हैं।  इस लेख में हम आंकड़ों के आधार पर इसका विश्लेषण करेंगे, ताकि समझ आए कि यह बदलाव व्यावसायिक दुनिया और समाज के लिए कितना क्रांतिकारी हो सकता है। खंड I: स्वास्थ्य की नींव; ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य हमारा यह विश्व (स्थावर जंघम प्राणी) एक प्राकृतिक घड़ी पर चलते है; जिसे "सर्कैडियन रिदम" कहते हैं।  आयुर्वेद, शास्त्र और आधुनिक विज्ञान तीनों इस बात पर सहमत हैं कि इस घड़ी से तालमेल बिठाने से स्वास्थ्य में अभूतपूर्व सुधार होता है। ब्रह्म मुहूर्त; सूर्योदय से करीब 90 मिनट पहले का समय; इसका आदर्श उदाहरण है। आयुर्वेद में इसे जागने और ध्यान के ल...

सुनहरा पिंजरा या नई गुलामी?

  'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है।  मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...