क्या हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे? शाम की चाय के साथ बहस आज फिर गर्म हो चुकी थी। २१वीं सदी का युवा रोहन लैपटॉप पर एक आर्टिकल पढ़ते हुए गुस्से और उत्साह के मिले-जुले भाव में था। उसके सामने बैठे थे उसके नानाजी, पंडित विश्वंभरनाथ, जो न केवल संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे बल्कि विज्ञान में भी उनकी गहरी पैठ थी। "नानाजी, यह सब दकियानूसी बातें हैं!" रोहन ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा। "आज हम ग्लोबलाइजेशन के दौर में हैं। हाइब्रिड बीजों (Hybrid Seeds) ने खेती में कमाल कर दिया है, उत्पादन दुगुना हो गया है। और आप लोग अभी भी 'शुद्धता', 'देसी पद्धति' और 'वर्ण-व्यवस्था' जैसी पुरानी बातों पर अड़े हैं? मिश्रण (Mixing) ही भविष्य है!" नानाजी ने शांति से अपनी चाय की चुस्की ली और अपना चश्मा ठीक करते हुए मुस्कुराए। "रोहन, बेटा, तुम्हारा उत्साह जायज है क्योंकि तुम 'उत्पादन' (Production) देख रहे हो, 'परिणाम' (Consequence) नहीं। क्या तुमने कभी सोचा है कि किसान को हर साल नया बीज क्यों खरीदना पड़ता है? वह अपनी ही फसल के बीज को दोबारा क्यों नहीं बो सकत...