संप्रभुता की चतुर रक्षा और भारत


            अमेरिकी संघीयता से भारत क्या सीख सकता है?

भूमिका: जब दुनिया एक जाल बन जाए

एक समय था जब किसी देश की सीमाएँ तोड़ने के लिए सेनाएँ आती थीं। तोपें चलती थीं, झंडे गाड़े जाते थे।
आज का आक्रमण अधिक परिष्कृत है। अब सेनाओं के स्थान पर "संधियाँ" आती हैं, तोपों के स्थान पर गैर-सरकारी संगठन सक्रिय होते हैं और झंडों के स्थान पर अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित किए जाते हैं।

मेरे मत में इस नए युग का सबसे बड़ा साधन वैश्विक संस्थाएँ हैं—जैसे UN, WHO, IMF, ICC और WTO
जो विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संधियों, मानकों और दायित्वों के माध्यम से राष्ट्रीय सरकारों पर प्रभाव डालती हैं और कई परिस्थितियों में उनके निर्णयों को प्रभावित करती हैं।

ऐसे वातावरण में अमेरिका की संघीय व्यवस्था एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

अमेरिकी संविधान की दोहरी ढाल

अमेरिकी संविधान 1787 में बनाया गया था और आज भी प्रभावी है। इसकी स्थिरता के प्रमुख कारणों में से एक उसका दसवाँ संशोधन (Tenth Amendment) माना जाता है।

10वां संशोधन का मूल सिद्धांत है:

~ "जो शक्तियाँ संविधान द्वारा संघीय सरकार को नहीं दी गई हैं और राज्यों को निषिद्ध नहीं की गई हैं, वे राज्यों या जनता के लिए सुरक्षित हैं।" ~

यह व्यवस्था दो प्रकार की संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है।
पहली, संघीय सरकार के अत्यधिक केंद्रीकरण के विरुद्ध।
दूसरी, यह कि अनेक विषयों पर राज्यों की स्वायत्तता बनी रहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का व्यावहारिक क्रियान्वयन भी राज्यों की सहभागिता पर निर्भर हो सकता है।
केंद्र सरकार कोई संधि कर सकती है, लेकिन उसके कार्यान्वयन में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। यही अमेरिकी संघीय ढाँचे की विशेषता है—

एक राष्ट्र, किंतु अनेक संवैधानिक स्तरों पर शक्ति का वितरण।

वैश्विक नीतियों के संदर्भ में राज्यों की भूमिका

सीमाओं की सुरक्षा और राज्यों की पहल
UN के शरणार्थी संबंधी मानकों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण कई बार अमेरिका पर राजनीतिक, नैतिक तथा कुछ कानूनी दायित्वों का दबाव पड़ता है।
ऐसी परिस्थितियों में टेक्सास ने "Operation Lone Star" जैसी पहल करते हुए अपनी सीमा सुरक्षा को मजबूत किया और यह तर्क दिया कि राज्य की सुरक्षा तथा सार्वजनिक व्यवस्था उसके अपने अधिकार क्षेत्र के विषय हैं।
दूसरी ओर कैलिफोर्निया ने "Sanctuary State" नीति अपनाई और संघीय आव्रजन प्रवर्तन में सीमित सहयोग का रास्ता चुना।
दोनों राज्यों की नीतियाँ एक-दूसरे के विपरीत थीं, किंतु दोनों ने अपने संवैधानिक अधिकारों का सहारा लिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी संघीय व्यवस्था राज्यों को पर्याप्त नीति-निर्माण की स्वतंत्रता प्रदान करती है।

भांग (Cannabis) नीति का उदाहरण

1960 के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी और रिचर्ड निक्सन की "War on Drugs" नीति और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रयासों ने विश्व स्तर पर कैनबिस के विरुद्ध कठोर प्रतिबंधों को लगवाए।

इसके बावजूद 2010 के दशक में अमेरिका के अनेक राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर चिकित्सा और मनोरंजन संबंधी उपयोग के लिए कैनबिस को वैध बनाया।
मेरे मत में इसका परिणाम यह हुआ कि अनुसंधान, उद्योग, पेटेंट और औषधि विकास के क्षेत्र में अमेरिका को बढ़त मिली, जबकि भारत में NDPS अधिनियम जैसे कानूनी प्रतिबंधों के कारण आयुर्वेद और औषधीय अनुसंधान की संभावनाएँ अपेक्षाकृत सीमित रहीं।
आज भी "भांग के फूल" पर रिसर्च और दवा निर्माण अत्यंत कठिन है।

भारत की स्थिति: खुले द्वार और वैश्विक प्रभाव

मैकाले से आधुनिक वैश्विक संस्थाओं तक
1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन का प्रस्ताव रखा था।
मेरे मत में औपनिवेशिक शासन समाप्त होने के बाद भी पश्चिमी विचारधारात्मक प्रभाव विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, शैक्षिक ढाँचों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से जारी है।
आज शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक अध्ययन और सामाजिक सिद्धांतों जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय मानकों का प्रभाव भारतीय संस्थानों तक पहुँच रहा है। मेरे विचार से यह केवल शैक्षणिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव का भी विषय है।

विदेशी NGO और नीति-निर्माण

2015 में भारत सरकार ने Greenpeace India के विरुद्ध कार्रवाई की थी, यह आरोप लगाते हुए कि उसकी गतिविधियाँ राष्ट्रीय आर्थिक हितों और कुछ विकास परियोजनाओं को प्रभावित कर रही थीं।
मेरे मत में विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने वाले कुछ संगठन भारत की आंतरिक नीतियों और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

Ford Foundation के संदर्भ में भी मेरा मत है कि उसके वित्तपोषण का लाभ ऐसे संगठनों को मिला जिन्होंने अनुच्छेद 370 के निरसन, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) तथा अन्य सरकारी नीतियों का विरोध किया।

FCRA के माध्यम से इन गतिविधियों पर कुछ नियंत्रण स्थापित हुआ, किंतु यह नियंत्रण काफी हद तक केंद्र सरकार की नीतिगत इच्छाशक्ति पर निर्भर रहता है।

धर्मांतरण और धार्मिक संस्थाएँ
भारत के अनेक राज्यों में हिंदू मंदिरों के प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण है, जबकि चर्च और मस्जिदों के प्रशासनिक ढाँचे अलग व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होते हैं।
मेरे मत में यह असमानता है।
साथ ही, विदेशी वित्तपोषण से जुड़े धर्मांतरण के प्रश्न और उन पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की टिप्पणियाँ भी भारत की आंतरिक नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं।

मेरे विचार में भारत की केंद्र सरकार कई अवसरों पर ऐसे अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना करती है और अक्सर उनसे प्रभावित भी होती है।

भारत के लिए संभावित सबक
1. राज्यों को अधिक संवैधानिक सुरक्षा
यदि भारत किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के कारण सांस्कृतिक या सामाजिक रूप से विवादास्पद नीतियाँ अपनाए, तो राज्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर उन्हें अपने अनुसार लागू कर सकें।

इससे विविध सांस्कृतिक परंपराओं वाले राज्यों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी।

2. FCRA पर राज्यों की भूमिका

वर्तमान में FCRA एक केंद्रीय कानून है।

यदि राज्यों को भी विदेशी वित्तपोषित संगठनों की गतिविधियों पर स्वतंत्र निगरानी और नियंत्रण का अधिकार मिले, तो वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक कदम उठा सकेंगे।

यदि किसी एक भी राज्य में ऐसा संगठन प्रतिबंधित हो जाए, तो उसके अन्य राज्यों में संचालन पर भी व्यावहारिक प्रभाव पड़ सकता है।

3. संस्कृति और धर्म से जुड़े विषय

धर्मांतरण विरोधी कानून अभी मुख्यतः राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
मेरे मत में मंदिर प्रबंधन, धार्मिक शिक्षा और सांस्कृतिक संस्थाओं जैसे विषयों पर राज्यों की संवैधानिक स्थिति और अधिक स्पष्ट तथा सुदृढ़ होनी चाहिए, ताकि बाहरी दबावों के कारण इन क्षेत्रों में अनावश्यक हस्तक्षेप न हो।

आवश्यक संतुलन

राज्यों को असीमित शक्तियाँ देना भी उचित नहीं होगा।
सोवियत संघ और यूगोस्लाविया जैसे उदाहरण बताते हैं कि अत्यधिक विकेंद्रीकरण और अलगाववादी प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन सकती हैं।
भारत की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। इसलिए यहाँ संतुलित संघीय व्यवस्था की आवश्यकता है।
मेरे मत में एक संभावित मॉडल इस प्रकार हो सकता है—
- राष्ट्रीय सुरक्षा: पूर्णतः केंद्र के पास।
- विदेश नीति: पूर्णतः केंद्र के पास।
- आर्थिक नीति: केंद्र और राज्यों के सहयोग से।
- संस्कृति, धर्म, शिक्षा तथा विदेशी NGO से संबंधित विषयों में राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता।
इस प्रकार यदि कोई वैश्विक संस्था भारत की शिक्षा, संस्कृति या धार्मिक नीतियों पर दबाव डाले, तो केंद्र यह कह सके कि इन विषयों में राज्यों की संवैधानिक भूमिका निर्णायक है, और राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें।

निष्कर्ष
संप्रभुता केवल सीमाओं की रक्षा से सुरक्षित नहीं रहती; उसकी रक्षा संविधान और संस्थागत संरचना भी करती है।
मेरे मत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी भारत पर अनेक वैचारिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़े हैं, जिन्होंने देश की दिशा को प्रभावित किया है।

CAA, FCRA संशोधन, अनुच्छेद 370 का निरसन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जुड़े अनेक प्रयास इस व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं।

किन्तु यदि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान और नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखना चाहता है, तो संघीय ढाँचे में राज्यों की भूमिका पर गंभीर पुनर्विचार किया जा सकता है।

अमेरिका का दसवाँ संशोधन कम-से-कम यह अवश्य सिखाता है कि शक्ति का विकेंद्रीकरण, यदि संतुलित ढंग से किया जाए, तो वह संप्रभुता की एक अतिरिक्त संवैधानिक सुरक्षा बन सकता है।

#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

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