व्यवस्था का जाल: एक नेता की मजबूरी Vs आम आदमी

व्यवस्था का जाल: एक नेता की मजबूरी Vs आम आदमी


यह भारत की नहीं वैश्विक समस्या है, ग्लोबल साउथ इसीलिये गरीब है और अफ्रीका दयनीय ।। 

नोट: मीडिया को जागना होगा और उस व्यवस्था के पीछे के लोगों को बेनकाब करना होगा।। 

कल्पना कीजिए एक नेता है। किसी भी देश का, भारत का, ब्राजील का, नाइजीरिया का, या फ्रांस का। वह चुनाव जीतकर आता है। उसके भाषण में गरीबों की बात है, किसानों की बात है, युवाओं के रोजगार की बात है। जनता ने उस पर भरोसा किया है।

लेकिन कुर्सी पर बैठते ही उसे एहसास होता है कि असली सत्ता उसके हाथ में नहीं है।

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की हकीकत है जो दशकों से बनाई गई है, जिसमें हर नेता, चाहे वह कितना भी ईमानदार हो, धीरे-धीरे उसी का हिस्सा बन जाता है।

आइए समझते हैं कैसे।


पहली जंजीर: IMF और World Bank का "सहायता" का जाल

जब किसी देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती है तो वह IMF के पास जाता है। लेकिन यह सहायता नहीं, एक शर्त है। IMF और World Bank की शर्तें स्वीकार करने का अर्थ है, मुक्त व्यापार लागू करो, सरकारी कंपनियाँ बेच दो, सरकारी खर्च घटाओ।

और परिणाम क्या होता है? 81 विकासशील देशों पर 1986 से 2016 तक हुए शोध में पाया गया कि IMF की संरचनात्मक सुधार शर्तें बेरोजगारी बढ़ाती हैं, सरकारी राजस्व घटाती हैं, और बुनियादी सेवाओं की लागत बढ़ा देती हैं।

नेता चाहता है कि स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च बढ़े। लेकिन IMF की शर्तें ऋणदाताओं के पुनर्भुगतान को जनकल्याण से ऊपर रखती हैं।

अर्जेंटीना इसका जीता-जागता उदाहरण है। 2018 में उसने IMF से 57 अरब डॉलर का कर्ज लिया और फिर से कठोर कटौती, बढ़ती महँगाई और करोड़ों लोगों के गरीबी में धकेले जाने का दौर शुरू हो गया।

नेता बदला, नीति नहीं बदली।


दूसरी जंजीर: वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में वोट किसका चलता है

नेता सोचता है कि चलो, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाऊँगा। लेकिन वहाँ भी खेल पहले से तय है।

IMF में अमेरिका के पास लगभग 17 प्रतिशत मतदान शक्ति है। वह एकमात्र देश है जो बड़े फैसलों पर वीटो कर सकता है। जबकि 180 से अधिक विकासशील देशों के पास मिलकर आधी से भी कम वोटिंग पावर है।

यानी एक देश तय करता है, बाकी दुनिया मानती है।

नेता की आवाज उठती है, गूँजती नहीं।


तीसरी जंजीर: असमानता की वह मशीन जो रुकती नहीं

नेता ब्याज दरें घटाता है ताकि आम आदमी को राहत मिले। लेकिन वह पैसा जाता कहाँ है? वापस शेयर बाजार में, अमीरों की जेब में।

यह कोई सिद्धांत नहीं, एक आँकड़ा है। IMF और World Bank से कर्ज लेने वाले 106 देशों में से 64 देशों में, यानी 60 प्रतिशत में, आय असमानता या तो ऊँची है या बढ़ रही है।

शीर्ष 10 प्रतिशत परिवारों के पास शेयर बाजार का 90 प्रतिशत हिस्सा है। निचले 90 प्रतिशत परिवारों पर 95 प्रतिशत कर्ज है।

2023 में अमीर देशों ने अपनी राष्ट्रीय आय का 13 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा पर खर्च किया। जबकि सबसे गरीब 40 प्रतिशत देशों में यह मात्र 1.5 प्रतिशत था।

और नतीजा वही है जो आप अपने जीवन में महसूस करते हैं। जो चीजें इंसान की जरूरी आवश्यकता, घर, शिक्षा, स्वास्थ्य, वे महँगी होती जाती हैं। जिन चीजों की कम जरूरत है, मोबाइल, कपड़े, टीवी, वे सस्ती होती जाती हैं। आज का इंसान ज्यादा "सामान" रखता और खरीदता है, लेकिन वास्तव में वह बीस साल पहले से ज्यादा गरीब है।


चौथी जंजीर: दो अलग-अलग दुनियाएँ, एक में मूल्य गिरता है, दूसरे में बढ़ता है

यहाँ एक ऐसी बात है जो कोई स्कूल नहीं पढ़ाता, लेकिन यही असली आर्थिक विभाजन की जड़ है।

मध्यम वर्ग जो खरीदता है, उसकी कीमत गिरती है। अति-धनी वर्ग जो खरीदता है, उसकी कीमत बढ़ती है।

यह संयोग नहीं, यह व्यवस्था है।

एक मध्यमवर्गीय परिवार नई कार खरीदता है। पाँच साल में उसकी कीमत आधी हो जाती है। ब्रांडेड कपड़े, लेटेस्ट गैजेट, नया स्मार्टफोन, यह सब उपभोग की वस्तुएँ हैं। इन्हें खरीदते ही इनका मूल्य गिरना शुरू हो जाता है।

लेकिन अति-धनी वर्ग क्या खरीदता है?

Patek Philippe की एक घड़ी खरीदी जाती है। वह अपने खुदरा मूल्य का औसतन 130 प्रतिशत से अधिक बनाए रखती है, यानी खरीदते ही वह मुनाफे में होती है। 1990 के दशक में 30,000 फ्रैंक में खरीदी गई Nautilus आज 2,00,000 AED से अधिक की है।

Mont Blanc का Limited Edition पेन, दुर्लभ कला, प्राचीन वस्तुएँ, यह सब समय के साथ और दुर्लभ होती हैं, और इनका मूल्य बढ़ता है।

Nike के लिमिटेड एडिशन जूते हो, या किसी इतालवी डिजाइनर की लिमिटेड एडिशन कार या कपड़े सब का मूल्य बढ़ता ही है।

अचल संपत्ति के बारे में तो सब जानते हैं। लंदन के प्रमुख इलाकों की संपत्तियाँ एक दशक में अपने शुरुआती मूल्य से दोगुनी हो जाती हैं।

एक तरफ वह व्यक्ति है जो EMI पर नई कार लेता है। पाँच साल बाद उसके हाथ में आधी कीमत की गाड़ी और पूरा कर्ज होता है। दूसरी तरफ वह व्यक्ति है जो Patek Philippe खरीदता है। पाँच साल बाद उसके हाथ में दोगुनी कीमत की संपत्ति होती है।

दोनों ने "खर्च" किया। लेकिन एक गरीब हुआ, एक अमीर।

और विज्ञापन की दुनिया मध्यम वर्ग को इन्हीं उपभोग की वस्तुओं को खरीदने के लिए प्रेरित करता है। विज्ञापन से, सोशल मीडिया से, status symbol की संस्कृति से। यह सब मिलकर मध्यम वर्ग को एक ऐसी दौड़ में दौड़ाते हैं जिसमें वह जितना खर्च करता है, उतना ही पीछे रह जाता है।


पाँचवीं जंजीर: गरीब महँगा खरीदता है, सस्ता बेचता है, और फिर भी ज्यादा टैक्स देता है

यह शायद इस पूरी व्यवस्था का सबसे क्रूर सत्य है।

अर्थशास्त्र में इसे "Poverty Premium" कहते हैं। गरीब लोग खाने-पीने से लेकर उधार लेने तक, हर चीज के लिए अमीरों से ज्यादा कीमत चुकाते हैं।

कारण बहुत सरल है। थोक में खरीदने की क्षमता नहीं।

जो आदमी 5 किलो आटा एक बार में खरीद सकता है, उसे प्रति किलो कम कीमत मिलती है। जो आदमी केवल आधा किलो खरीद सकता है, उसे प्रति किलो ज्यादा कीमत देनी पड़ती है। वह गरीब है, इसलिए और गरीब होता है।

किस्त पर सामान लेने की सुविधाएँ ऊँची ब्याज दरों के साथ आती हैं, और इनका उपयोग वही लोग करते हैं जो पूरी कीमत एक बार नहीं चुका सकते। यानी एक ही सामान के लिए गरीब दोगुना चुकाता है, किस्त और ब्याज में।

बिजली, पानी, दूरसंचार जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए भी जिनके पास पर्याप्त क्रेडिट नहीं है, उन्हें ज्यादा जमा राशि और अधिक शुल्क देना पड़ता है।

और जो उत्पाद गरीब बनाता है या जो श्रम वह देता है, उसकी कीमत भी वह खुद तय नहीं करता। बाजार तय करता है। किसान के पास भंडारण की सुविधा नहीं, इंतजार की क्षमता नहीं। फसल तुरंत बेचनी है, चाहे भाव कुछ भी मिले। अमीर निवेशक सही समय का इंतजार करता है। गरीब मजदूर नहीं कर सकता क्योंकि आज की रोटी आज चाहिए।

इसलिए उसका श्रम और उसका उत्पाद, दोनों कम कीमत पर बिकते हैं।

अब टैक्स की बात करते हैं।

GST, Sales Tax, Excise Duty, ये सब "सबके लिए समान" दिखते हैं, लेकिन हैं नहीं। अमेरिका में सबसे कम आय वाले लोग, सबसे अधिक आय वालों की तुलना में राज्य और स्थानीय करों में अपनी आय से 54 प्रतिशत अधिक हिस्सा देते हैं। निम्न-आय परिवार अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा खाने, कपड़े और घरेलू सामान पर खर्च करते हैं, इसलिए इन वस्तुओं पर लगने वाले कर का बोझ उन पर कहीं ज्यादा पड़ता है।

लेकिन सरकारी "अनुग्रह" किसे मिलता है?

यहाँ भाषा का खेल देखिए। जब गरीब को सहायता मिलती है तो उसे "रेवड़ी", "welfare", "मुफ्तखोरी" कहा जाता है। जब अमीर कंपनियों को सहायता मिलती है तो उसे "stimulus", "bailout", "आर्थिक प्रोत्साहन" कहा जाता है।

अमेरिका में केवल एक वर्ष में कॉर्पोरेट सब्सिडी पर 181 अरब डॉलर खर्च होते हैं। और यह नियमित वार्षिक खर्च है, बड़े bailout से अलग। Federal Reserve ने बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को 7.6 ट्रिलियन डॉलर उपलब्ध कराए।

भारत में शीर्ष 20 प्रतिशत घराने, सबसे गरीब घरानों की तुलना में सरकारी सब्सिडी से प्रति रुपये 1.43 रुपये पाते हैं।

गरीब टैक्स देता है। अमीर सब्सिडी लेता है। और दोनों को एक ही व्यवस्था चलाती है।


छठी जंजीर: लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास

और यहीं है वह बात जो नेता को रात को सोने नहीं देती।

गरीब के पास भी वोट है, अमीर के पास भी। तो नेता चुनाव जीतने के लिए गरीब से वादे करता है। लेकिन सत्ता में आते ही वह उसी आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है जो अमीरों की सेवा करती है।

आलोचक इन वैश्विक शर्तों को नव-उपनिवेशवाद का औजार कहते हैं, जिसमें धनी देश IMF और World Bank के जरिए विकासशील देशों को कर्ज देते हैं और बदले में उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल देते हैं।

नेता बदलता रहता है। व्यवस्था वही रहती है।

US में आज McDonald's की तुलना में ज्यादा Private Equity firms हैं। बीस हजार बनाम चौदह हजार। यह आँकड़ा बताता है कि आज बिजनेस में आम लोगों को खाना खिलाने की तुलना में अति-धनी लोगों की सेवा करने में ज्यादा मुनाफा है। इसलिए लोग केवल अमीरों के लिए बिजनेस क्यों नहीं बनाएंगे।

ब्याज दरें घटाओ, पैसा अमीरों के पास जाता है जो इसे वापस शेयर बाजार में लगा देते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्थाएं और शेयर बाजार बढ़ते रहते हैं, लेकिन औसत व्यक्ति वास्तव में बहुत ज्यादा गरीब महसूस करता है।

और साथ में नौकरी की असुरक्षा। दुनिया भर के बहुत से औसत लोगों को लगता है कि उनके पास बीस साल पहले की तुलना में job security नहीं है। और वे अपने 40 की उम्र के आसपास इस्तीफा देने के लिए मजबूर किए जा सकते हैं।


तो क्या उम्मीद नहीं है?

उम्मीद है। लेकिन वह व्यवस्था के भीतर से नहीं आएगी।

जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हमारे नेता अकेले इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते, तब तक हम हर चार या पाँच साल में नया नेता चुनेंगे और निराश होते रहेंगे।

असली सवाल यह नहीं है कि यह नेता अच्छा है या बुरा। असली सवाल यह है कि वह व्यवस्था कौन-सी है जो हर नेता को मजबूर कर देती है।

और उस सवाल का जवाब ढूंढने की शुरुआत तब होती है जब हम सोशल मीडिया पर किसी नेता को गाली देना बंद करके यह समझने लगते हैं कि खेल कहाँ से खेला जा रहा है।

यह लेख किसी नेता पर नहीं है।

यह उस व्यवस्था पर है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहने, कुछ और ही खेल खेल रही है।

नोट: मीडिया को जागना होगा और उस व्यवस्था के पीछे के लोगों को बेनकाब करना होगा।। 

अन्यथा शिव ही मालिक।।

#अलख_निरंजन
#स्वामी_सच्चिदानंदन_जी_महाराज

 

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