संलग्न दस्तावेज बिना नकद निवेश की चक्रीय ग्रामीण परियोजना? NCP 2025 पर आधारित एक भारतीय गांव के 5 क्रांतिकारी विचार जो हमारी अर्थव्यवस्था को बदल सकते हैं जब हम ग्रामीण विकास के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर एक ही तस्वीर दिमाग में आती है: ऐसी परियोजनाएँ जो इरादों में तो नेक होती हैं लेकिन हमेशा अनुदान (grants) पर निर्भर, तकनीकी रूप से साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। उन्हें सामाजिक लागत (social cost) के रूप में देखा जाता है, न कि आर्थिक इंजन के रूप में। प्रचलित धारणा यह है कि बाहरी भारी-भरकम फंडिंग और कॉर्पोरेट स्वामित्व के बिना किसी गांव में बड़े पैमाने पर लाभदायक बुनियादी ढांचा बनाना असंभव है। हमने हाल ही में एक ऐसा दस्तावेज़ बनाया, जो इन धारणाओं को पूरी तरह से तोड़ देता है। यह किसी थिंक टैंक का सैद्धांतिक शोध पत्र नहीं था, बल्कि मध्य प्रदेश, भारत के एक गांव का विस्तृत परियोजना प्रस्ताव था। इसे "मां रेवा इंटीग्रेटेड गौ-ऊर्जा मॉडल" कहा गया है। यह एक आत्मनिर्भर, ग्राम सभा (समुदाय) के स्वामित्व वाली सहकारी समिति (cooperative) की योजना है जो सामाजिक रूप से परिवर्तनकारी ह...
क्या हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे? शाम की चाय के साथ बहस आज फिर गर्म हो चुकी थी। २१वीं सदी का युवा रोहन लैपटॉप पर एक आर्टिकल पढ़ते हुए गुस्से और उत्साह के मिले-जुले भाव में था। उसके सामने बैठे थे उसके नानाजी, पंडित विश्वंभरनाथ, जो न केवल संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे बल्कि विज्ञान में भी उनकी गहरी पैठ थी। "नानाजी, यह सब दकियानूसी बातें हैं!" रोहन ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा। "आज हम ग्लोबलाइजेशन के दौर में हैं। हाइब्रिड बीजों (Hybrid Seeds) ने खेती में कमाल कर दिया है, उत्पादन दुगुना हो गया है। और आप लोग अभी भी 'शुद्धता', 'देसी पद्धति' और 'वर्ण-व्यवस्था' जैसी पुरानी बातों पर अड़े हैं? मिश्रण (Mixing) ही भविष्य है!" नानाजी ने शांति से अपनी चाय की चुस्की ली और अपना चश्मा ठीक करते हुए मुस्कुराए। "रोहन, बेटा, तुम्हारा उत्साह जायज है क्योंकि तुम 'उत्पादन' (Production) देख रहे हो, 'परिणाम' (Consequence) नहीं। क्या तुमने कभी सोचा है कि किसान को हर साल नया बीज क्यों खरीदना पड़ता है? वह अपनी ही फसल के बीज को दोबारा क्यों नहीं बो सकत...