॥ हाँ, मैं ब्राह्मण हूँ ॥ X Or Twitter शास्त्र संभाले मेधा से, संस्कृति की लौ जलाई है, अब्राहमिक झंझावातों में, मैंने अस्मिता बचाई है। क्या आक्रांता की शक्ति ने, मेरा स्वर कभी रोका था? क्या दीनता की बेड़ियों ने, मेरा संकल्प तोड़ा था? कहलाया मैं सर्वशक्तिमान, मति का मैं विस्तार रहा, फिर क्यों ये निर्धनता झेली, क्यों रिक्त मेरा भंडार रहा? क्यों मुझ पर 'पक्षपाती' होने के, तीखे बाण चलाए हैं? ये प्रश्न आज भी ज्वलंत हैं, जो सम्मुख मेरे आए हैं। संवैधान के इस युग में जब, नियम पृष्ठ पर ढलते हैं, सत्ता के गलियारों में, बोलो! कितने 'सच्चे' पलते हैं? कौन यहाँ ब्रह्मचारी है? कौन यहाँ निष्पक्ष खड़ा? सत्ता की इस चौखट पर, कौन धर्म से नहीं बड़ा? शास्त्रों में गूँजे श्री राम, संविधान कहता मै शक्तिमान, मेरे डंडे में है वह ताप, जिसके आगे शिव भी शांत। एक तरफ सहस्राब्दी का, संस्कृति-सम्मत स्थायित्व रहा, दूजे ने सत्तर वर्षों में, संकट में डाला अस्तित्व यहां। मैं पूछता हूँ आज, इन आधुनिक संस्थानों से, क्या शेष बची है मानवता, इन सत्ता-अभिमानों से? क्या सादगी, ...
'डिजिटल जमींदारी' की आहट और हमारा भविष्य कल शाम की बात है। मैं अपने घर की छत पर टहल रहा था और दूर शहर की चमकती रोशनियों को देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही एक दोस्त की बातें गूंज रही थीं जो उसने दोपहर को बड़े जोश में कही थीं। उसका कहना था, "यार, तुम बहुत ज्यादा सोचते हो। देख लेना, आने वाला वक्त गजब का होगा। रोबोट्स आ रहे हैं, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सब संभाल लेगा। हमें न तो कड़ी धूप में काम करना होगा, न ही ऑफिस की चिक-चिक सहनी होगी। बस आराम ही आराम होगा।" उसकी बातों में एक अजीब सा नशा था, एक सुनहरे भविष्य का सपना। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। एक ऐसी बेचैनी, जैसे कोई अनहोनी दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। क्या वाकई सब कुछ इतना अच्छा होने वाला है? या फिर इस चमक-दमक के पीछे हम किसी बहुत गहरी और अंधेरी खाई की तरफ बढ़ रहे हैं? यह सवाल मुझे सोने नहीं दे रहा था। आज मैं आपसे किसी किताब की थ्योरी या भारी-भरकम अर्थशास्त्र पर बात करने नहीं बैठा हूँ। मैं बस उस डर और उस हकीकत को साझा करना चाहता हूँ जो शायद हम सब महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन स्वीकारने ...